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द न्यूयार्क टाइम्स से विशेष अनुबंध के तहत:अमेरिका में यूनिवर्सिटी की शर्त से बढ़ी विदेशी छात्रों की चिंता, डब्ल्यूएचओ से मंजूर टीका लगवाने पर ही कैंपस में एंट्री

4 महीने पहलेलेखक: रुक्मिणी कैलिमाची
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मिलोनी ने कोवैक्सीन लगवाई है। - Dainik Bhaskar
मिलोनी ने कोवैक्सीन लगवाई है।

25 साल की भारतीय छात्रा मिलोनी दोषी अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री करने जा रही हैं। वे भारत में बनी कोवैक्सीन के दोनों डोज लगवा चुकी हैं और कैंपस में जाने के लिए तैयार हैं। लेकिन अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की एक शर्त ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, 400 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज ने कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले छात्रों को ही कैंपस में एंट्री की इजाजत दी है। लेकिन उनकी एक शर्त भारत समेत लाखों विदेशी छात्रों के लिए परेशानी बन गई है।

शर्त यह है कि वैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंजूरी अनिवार्य है। बस, यही शर्त मिलोनी जैसे छात्रों के लिए सिरदर्द बन गई है क्योंकि कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ ने मंजूरी नहीं दी है। ऐसा ही चीन और रूस के छात्रों के साथ भी है। अमेरिका में डब्ल्यूएचओ ने सिर्फ फाइजर, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन के टीकों को मंजूरी दी है।

उधर, कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने मिलोनी से कहा है कि वहां पहुंचने पर दोबारा वैक्सीन लगवानी पड़ेगी। इसने मिलोनी को डरा दिया है। वो कहती हैं, “मुझे इस बात का डर है कि फिर से वैक्सीन लगवाना उचित भी है या नहीं...और कितना सुरक्षित होगा?’

दरअसल, यूनिवर्सिटीज ने स्थानीय छात्रों को ध्यान में रखकर पॉलिसी तो बना दी, पर कमाई में सबसे ज्यादा हिस्सा देने वाले विदेशी छात्रों को भूल गईं। भारत से हर साल करीब दो लाख छात्र अमेरिका पढ़ने जाते हैं। यह चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी से पहले अमेरिकी यूनिवर्सिटीज ने विदेश छात्रों से ट्यूशन खर्च के तौर पर 3,900 करोड़ डॉलर यानी करीब 2.88 लाख करोड़ रुपए की कमाई की थी।

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