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अफगानिस्तान के जलालाबाद में अब कोई हिंदू-सिख नहीं है:हिंदू-सिख सब छोड़ गए, पर रिश्ते ऐसे कि उनके लौटने तक मुस्लिम कारोबार संभाल रहे

2 महीने पहलेलेखक: जलालाबाद से रिफतउल्लाह ओरकजाई
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यह दुकान गुरुद्वारे के ठीक सामने है। इसके मालिक 14 अगस्त की रात को ही चले गए थे। अब इसे अफगानी मुस्लिम युवक चला रहा है। - Dainik Bhaskar
यह दुकान गुरुद्वारे के ठीक सामने है। इसके मालिक 14 अगस्त की रात को ही चले गए थे। अब इसे अफगानी मुस्लिम युवक चला रहा है।

अफगानिस्तान का जलालाबाद शहर तालिबानी क्रूरता के भयावह दौर में इंसानी रिश्तों की कुछ मार्मिक कहानियां रच रहा है। काबुल पर तालिबानी कब्जे वाली 14 अगस्त की रात से पहले ही यहां रहने वाले हिंदू और सिख परिवार के साथ कहीं चले गए।

कुछ भारत गए। कुछ यूरोप गए और कुछ काबुल के आसपास छिपकर बुरा वक्त गुजरने का इंतजार कर रहे हैं। इन परिवारों की यहां 50 से ज्यादा दुकानें हैं। इनमें से कुछ अब भी खुली हुई हैं। इन्हें स्थानीय अफगानी चला रहे हैं।

स्थानीयों का कहना- जाने वालों का व्यापार बंद नहीं होने देंगे
जलालाबाद शहद के बीचोंबीच जोन-1 में एक सिख डॉक्टर का क्लीनिक मो. खालिद नाम का अफगानी संभाल रहा है। खालिद कहते हैं- ‘मैं क्लीनिक के मालिक को रोज यहां के हालात की अपडेट देता हूं। हमें यकीन है कि हालात सुधरेंगे तो वे लौट आएंगे। तब तक हम उनका कारोबार बंद नहीं होने देंगे।’

हम मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा?
यहां पास में अमित सिंह की भी एक दुकान है। इसे रफीउल्लाह चला रहे हैं। वे कहते हैं- अमित भारत से रोज मुझे फोन करते हैं। हाल पूछते हैं। लेकिन, वे अभी लौट नहीं सकते। उनके आने तक मुझे ही उनकी जिम्मेदारी निभानी होगी। हम दशकों से साथ हैं, ऐसे समय में हम मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’

रोज गश्त लगाते हैं दो-तीन हथियारबंद तालिबानी
जलालाबाद में करीब 100 सिख परिवार थे। शहर के मुख्य बाजार में एक गुरुद्वारा है, जिसके चारों ओर दुकानें हैं। इनमें ज्यादातर सिखों की हैं। ये लोग दवाएं बेचते हैं। इन्हें ‘योनाई डॉक्टर’ कहा जाता है। गुरुद्वारे के सभी दरवाजे अंदर से बंद हैं। दस्तक देने पर अंदर से किसी ने बताया, अभी यहां अरदास नहीं होती। यहां रोज दो-तीन हथियारबंद तालिबानी गश्त करते हैं। लोगों से पूछताछ करते हैं। हालांकि, दुकान संभाल रहे लोगों को नहीं टोकते।

जब मुस्लिम ही देश छोड़ रहे तो हिंदू-सिख कैसे रुक जाएं

एक स्थानीय पत्रकार ने बताया- ‘तालिबान ने अल्पसंख्यकों से भले सुरक्षा का वादा किया हो लेकिन उसकी बातों पर किसी को भरोसा नहीं है। भरोसा कायम करने के लिए तालिबानी नेता कुछ प्रांतों में अल्पसंख्यकों से मुलाकात भी कर रहे हैं। हालांकि जब मुस्लिम ही देश छोड़ना चाहते हैं तो शायद ही कोई अल्पसंख्यक यहां रुकना चाहता हो।

काबुल के पास एक गुरुद्वारे में सिखों के साथ हिंदुओं ने भी शरण ले रखी है। ये लोग अलग-अलग प्रांतों में अपना सबकुछ छोड़कर यहां जुटे हैं। अलग-अलग देशों से शरणार्थी बनाने की गुहार लगा रहे हैं। जलालाबाद के एक अन्य पत्रकार ने बताया- अब यहां कोई हिंदू होगा भी तो मुस्लिम अफगानी की तरह रह रहा होगा।

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