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  • The Two year old Son Has Such A Disease Which Has No Any Treatment; Father Made Lab At Home, Prepared Medicine By Reading On Internet, Said I Will Not Give Up

दो साल के बेटे को ऐसी बीमारी जिसका इलाज नहीं:पिता ने घर पर ही बना दी लैब, इंटरनेट पर पढ़कर दवा तैयार की, कहा- हार नहीं मानूंगा

कुनमिंग6 दिन पहले
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वेई की गोद में हाओयांग। - Dainik Bhaskar
वेई की गोद में हाओयांग।
  • चीन के शु हाओयांग को मेनकेस सिंड्रोम, इस बीमारी के चलते तीन साल भी नहीं जी पाते बच्चे

चीन के दो साल के शु हाओयांग की जिंदगी कुछ ही माह की है, पर उसके पिता शु वेई उसे बचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते। बेटे के लिए वेई ने अपने फ्लैट में ही पिता के जिम में मेडिसिन लैब बना दी है। जहां वो बेटे के इलाज में काम आने वाली दवा बना रहे हैं।

हाओयांग को दुर्लभ मेनकेस सिंड्रोम है। यह आनुवंशिक विकार है, जो शरीर में तांबे का बनना रोकता है। इससे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के विकास में मुश्किल होती है। इस बीमारी के चलते बच्चे तीन साल भी नहीं जी पाते। एक लाख में एक बच्चे को ही यह सिंड्रोम होता है।

30 साल के वेई बताते हैं, ‘मेरे पास सोचने का वक्त नहीं है, कि इसे करना है या नहीं, मुझे तो यह करना ही था। बेटे को गोद में लिए वेई कहते हैं, ‘भले ही वह चल या बोल नहीं सकता, पर उसके पास एक आत्मा है और वह भावनाओं को महसूस करता है। डॉक्टरों द्वारा यह बताए जाने के बाद कि बीमारी लाइलाज है।

आराम पहुंचाने के लिए कॉपर हिस्टिडाइन दिया जाता है, पर लॉकडाउन के चलते चीन में यह मिल नहीं रहा। विदेश जाना संभव नहीं। तब उन्होंने खुद ही फार्मास्यूटिकल्स पर रिसर्च करते हुए इसे घर पर ही बनाना शुरू कर दिया। वेई ने बताया कि दोस्त और परिजन इसके खिलाफ थे, उन्हें यह असंभव लगता था।

मेनकेस पर ऑनलाइन दस्तावेज भी अंग्रेजी में थे, इन्हें समझने के लिए ट्रांसलेशन सॉफ्टवेयर की मदद ली। तब कॉपर हिस्टिडाइन का पता चला। उपचार शुरू करने के दो हफ्ते बाद ब्लड टेस्ट के रिजल्ट सामान्य आए। हाओयांग की मां से बेटे की यह स्थिति देखी नहीं जाती, इसलिए वे 5 साल की बेटी को लेकर अलग रहती हैं। हाईस्कूल तक पढ़े वेई बेटे की बीमारी से लड़ने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।

ऑनलाइन कारोबारी वेई कहते हैं,‘मैं नहीं चाहता कि बेटा सिर्फ मौत का इंतजार करे, भले ही मैं फेल हो जाऊं, पर चाहता हूं कि उसे एक उम्मीद दे सकूं।’ पिता की इस जद्दोजहद को देखकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की बायोटेक लैब वेक्टरबिल्डर ने इस बीमारी पर रिसर्च शुरू की है। जीन थेरेपी के ट्रायल कुछ माह में शुरू होंगे। पर हाओयांग को इसका फायदा मिलेगा, इसकी उम्मीद कम ही है।

खरगोशों और खुद पर दवा का ट्रायल किया, फिर बेटे को दी

वेई के पिता जिआनहोंग बताते हैं, वेई का ये मिशन बहुत कठिन था। पर छह हफ्ते तक उसने खुद को झोंककर दवाई बना ही ली। वेई ने पहले खरगोशों पर ट्रायल किया। इसके बाद खुद के शरीर में इंजेक्ट की। साइड इफेक्ट न दिखने पर बेटे पर इस्तेमाल शुरू किया। वेई के मुताबिक कमर्शियल वैल्यू नहीं होने से दवा कंपनियां को दिलचस्पी कम थी। पर मुझे तो दवा चाहिए ही थी, इसलिए घर पर ही बना दी।

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