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पड़ोसियों के हाल:बांग्लादेश में कट्‌टर ढांचे पर बवाल, कई गिरफ्तार तो पाक में तालिबान में भर्ती होने की होड़

2 महीने पहले
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ढाका में कट्‌टरपंथी संगठन के प्रदर्शनकारी को नियंत्रित करते सुरक्षाकर्मी। - Dainik Bhaskar
ढाका में कट्‌टरपंथी संगठन के प्रदर्शनकारी को नियंत्रित करते सुरक्षाकर्मी।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च के अंत में बांग्लादेश पहुंचे, तो मूड खुशनुमा होना चाहिए था। लेकिन कट्‌टरपंथी संगठन हिफाजत-ए-इस्लाम की अपील पर हजारों लोग मोदी के विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस दौरान पुलिस के साथ संघर्ष में 13 लोगों की मौत हो गई। उसके बाद से सरकार कट्‌टरपंथी संगठनों पर सख्त है। इनके कई बड़े नेताओं को जेल में डाला जा चुका है।

ये सख्ती सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग की रणनीति में बदलाव का प्रतीक है। लेकिन यह अचानक नहीं हुआ। पिछला एक दशक ऐसे संगठनों को समझाइश देने में गुजरा है। ये बदलाव 2009 में शेख हसीना वाजेद के दूसरी बार पीएम बनने के बाद शुरू हुआ। उन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का साथ देने वाले जमात-ए-इस्लामी के दिग्गज नेताओं को सलाखों में डाल दिया। इसके विरोध में उतरे कट्‌टरपंथियों को सरकार ने संदेश दिया कि हम इस्लाम के नहीं, जमात के खिलाफ हैं।

2015 में कई ब्लॉगर्स की नास्तिक बता हत्या कर दी गई। इलिनॉय यूनिवर्सिटी के प्रो. अली रियाज कहते हैं, ‘हिफाजत को लगने लगा था उसके आगे सरकार कुछ नहीं। पर अब कट्‌टरपंथी कह रहे हैं कि शेख हसीना बेहद ताकतवर हैं। यही वजह है कि कभी सरकार को हिला देने वाले हिफाजत के प्रमुख जुनैद बाबूनगरी गिरफ्तारी का विरोध करने के बजाय, अपने साथियों को रिहा करने की गुहार लगा रहे हैं।’

महिला अधिकार विरोधी शिक्षकों ने बनाया संगठन
हिफाजत-ए-इस्लाम के गठन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। इसका गठन 2010 में चट्टोग्राम (पहले चटगांव) में शिक्षकों के एक समूह ने किया था। वजह- महिलाओं को मिली विरासत और अधिकार। कट्‌टरपंथियों को यह फैसला रास नहीं आया, तो कथित पढ़े-लिखे शिक्षक विरोध में उतर आए थे। इससे पहले राजनीति में इस्लाम को बढ़ावा देने का काम काफी हद तक जमात-ए-इस्लामी और इसकी मुख्यधारा की सहयोगी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी जैसे धार्मिक दलों के हाथ में था।

पाक: तालिबान के लिए चंदा उगाही, भर्ती तेज
इस्लामाबाद।
दुनिया भर में पहले ही आशंका जताई जा रही थी कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद वहां पाकिस्तान का दखल और आतंकवाद बढ़ जाएगा। ऐसा होना शुरू भी हो गया है। पाकिस्तान में तालिबान के लिए चंदा उगाही और आतंकियों की भर्ती तेज हो गई है। डॉयचे वेले की एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान में बढ़ती हिंसा उसे वापस 1990 की स्थिति में पहुंचा सकती है, जब तालिबान का शासन था और हजारों पाकिस्तानी आतंकी उसमें शामिल हो गए थे।

वैसे तो पाकिस्तान ने अफगान तालिबान पर प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन कई कट्‌टरपंथी समूह और धार्मिक नेता तालिबान को समर्थन करते दिख रहे हैं। पेशावर विश्वविद्यालय के एरिया स्टडी सेंटर के पूर्व निदेशक मोहम्मद सरफराज खान कहते हैं, ‘ये लोग सोशल मीडिया पर अपील के जरिए धन भी जुटा रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा युवाओं को तालिबान ज्वाइन करने को भी कह रहे हैं। इतना सब होने के बावजूद इमरान खान की सरकार आंखें मूंदकर बैठी हुई है।’

1 मई को अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा सैनिकों की वापसी शुरू करने के बाद से अफगानिस्तान में संघर्ष नाटकीय रूप से बढ़ गया है। 11 सितंबर तक वहां से अमेरिकी सैनिक पूरी तरह वापसी कर लेंगे। जैसे-जैसे यह समय सीमा नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे आतंकी गुटों ने ज्यादा से ज्यादा इलाके पर कब्जा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। तोलो न्यूज के मुताबिक अफगान सुरक्षा बल फिलहाल 100 से ज्यादा इलाकों में तालिबान से लड़ रहे हैं। इस साल के महज 5 महीनों में तालिबान उन पर 3,500 से ज्यादा हमले कर चुका है।

नई नीति में धार्मिक पढ़ाई पर जोर, विवाद बढ़ा
पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। प्रधानमंत्री इमरान खान पूरे देश में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करने पर विचार कर रहे हैं। सरकार की योजना स्कूलों में कुरान का अनुवाद, नमाज और हदीस सीखने को अनिवार्य करने की है। पहले चरण में 5वीं कक्षा तक के बच्चों को शामिल किया जाएगा। नए विषयों को पढ़ाने के लिए हाफिज और कारी भी नियुक्त किए जाएंगे। इस फैसले की पाकिस्तान में काफी आलोचना हो रही है। लोगों का कहना है कि नई शिक्षा प्रणाली मौलवियों के वर्चस्व और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देगी। मदरसों की तुलना में स्कूलों में धार्मिक सामग्री ज्यादा हो जाएगी।

इमरान सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचे लोग
मानवाधिकार कार्यकर्ता पीटर जैकब ने बताया, अनिवार्य विषयों की प्रकृति धार्मिक है। यह संविधान के खिलाफ है। बेरोजगारी भी बढ़ेगी। कई लोगों ने नई नीति को कोर्ट में चुनौती दी है।

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