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जापान में 6 महीने में भालुओं के 13 हजार हमले:इन्हें राेकने के लिए राेबाेटिक भेड़िया बनाया, इसके गुर्राते ही भालू भाग जाते हैं

3 महीने पहलेलेखक: जूलियन रयाल
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सितंबर से अब तक 65 लोग हमले में जान गंवा चुके हैं। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
सितंबर से अब तक 65 लोग हमले में जान गंवा चुके हैं। (फाइल फोटो)
  • भालुओं से परेशान किसानाें ने ढूंढ़ा नया तरीका, खेतों में लगाई सेंसरयुक्त मशीन

जापान के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इन दिनों कोरोनावायरस से कहीं ज्यादा जंगली भालुओं के खौफ से परेशान हैं। यहां पिछले 6 महीनों के दौरान भालुओं के हमले की 13 हजार से ज्यादा घटनाएं हुई हैं, जो पांच सालों में सबसे ज्यादा है। सितंबर से अब तक 65 लोग हमले में जान गंवा चुके हैं।

भालू अब जंगल छाेड़कर शहर का रुख करते हुए फसलाें काे भी बर्बाद कर रहे हैं। परेशान किसानाें ने भालुओं से बचने का अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला है। अब वे भालुओं को भगाने के लिए रोबोटिक भेड़िए का इस्तेमाल कर रहे हैं। सेंसरयुक्त राेबाेटिक भेड़िया चलता-फिरता नहीं, लेकिन उसकी गुर्राहट, इसकी लाल चमकदार आंखें और खुले हुए जबड़े को देखकर जंगली जानवर भाग खड़े होते हैं।

ये रोबोटिक भेड़िया डेढ़ मीटर लंबा और 1 मीटर ऊंचा है। असली जानवर का लुक देने के लिए इस रोबोट के ऊपर जंगली जानवर जैसी खाल भी लगाई गई है। साथ ही यह अपना सिर 180 डिग्री के कोण पर घुमा सकता है। यह रोबोटिक भेड़िया सौर ऊर्जा से चलता है और तभी प्रतिक्रिया देता है, जब उसके सेंसर एरिया में कोई हलचल होती है।

इसके परीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने इसकी पीठ पर कैमरा लगा दिया था। इसकी रिकॉर्डिंग में दिखा कि इसको देखकर भालू समेत कई खतरनाक जानवर दुम दबाकर भाग गए थे। इसके बावजूद कई भालू भटकते हुए शहर आ जाते हैं। 16 अक्टूबर को इशिकावा के शाॅपिंग माॅल में एक भालू घुस आया। 13 घंटाें तक लाेग दहशत में रहे। उसने एक व्यक्ति के कंधे और पैर चबाकर बुरी तरह जख्मी कर दिया। पुलिस भी उस पर काबू नहीं पा सकी और आखिरकार उसे गाेली मार दी गई।

भालुओं की बढ़ती संख्या और खाने की कमी के कारण हमले बढ़ रहे

टाेक्याे यूनिवर्सिटी में पर्यावरण शिक्षा के प्राेफेसर केविन शाॅर्ट का कहना है कि जंगलों में भालुओं को खाना भी नहीं मिलेगा, ताे वे कैसे जी सकते हैं। एक और कारण है- इनकी बढ़ती संख्या। जापान में 15 से 20 हजार भालू हैं। इनका वजन 200 से 600 किग्रा है। पहले लाेग इनका शिकार करते थे। लेकिन 1915 के बाद से इनका शिकार नहीं हाे रहा है, इसलिए वे भी बेखाैफ हाे गए हैं और हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

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