ताइवान पर US-चीन में जंग का खतरा:बाइडेन की वॉर्निंग के बावजूद हमला कर सकता है ड्रैगन, कितना मुश्किल है ताइवान पर कब्जा करना

वॉशिंगटन4 महीने पहलेलेखक: वृष्टि नारद

अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी ताइवान विजिट पर जा रही हैं। चीन इसको लेकर बेहद परेशान है और लगातार अमेरिका को गंभीर नतीजे भुगतने की धमकी दे रहा है। पेलोसी की ताइवान विजिट की तारीख तो तय नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि वो अगस्त के पहले हफ्ते में ताइवान जा सकती है।

अगर ऐसा होता है तो 1997 के बाद पहली बार (25 साल बाद) अमेरिका का इतना बड़ा ओहदेदार इस देश की यात्रा करेगा। चीन हमेशा से ताइवान को अपना हिस्सा बताता है। दूसरी तरफ, ताइवान खुद को लोकतंत्र और आजाद मुल्क मानता है। अमेरिका किसी भी सूरत में ताइवान को चीन के हाथों में जाते नहीं देख सकता। यही टकराव की वजह भी है।

ताइवान यात्रा को लेकर अमेरिकी सेना ने नैंसी पेलोसी की सुरक्षा के लिए स्ट्रेटजी बनाना शुरू कर दिया है। पेलोसी के विमान को सुरक्षा घेरा देने की तैयारी की जा रही है।
ताइवान यात्रा को लेकर अमेरिकी सेना ने नैंसी पेलोसी की सुरक्षा के लिए स्ट्रेटजी बनाना शुरू कर दिया है। पेलोसी के विमान को सुरक्षा घेरा देने की तैयारी की जा रही है।

बहरहाल, रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद अब माना जा रहा है कि चीन भी पुतिन की राह पर चल सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने चीन को धमकी दी। कहा- अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो अमेरिका भी मिलिट्री एक्शन लेगा। सवाल ये उठता है कि क्या हकीकत में अमेरिका चीन को रोक पाएगा...

इसका जवाब है- शायद नहीं। इसकी दो वजह हैं-

  1. अमेरिका सिर्फ चीन को ताइवान पर हमला करने से रोकना चाहता है। अमेरिका इतना चाहता है कि ताइवान के पास सैन्य और अन्य संसाधन इतने रहें कि चीन आक्रमण करने से कतराए।
  2. एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन के पास ज्यादा सैन्य ताकत है। चीन की आर्मी मिलिट्री व्हीकल के मामले में अमेरिका से आगे है। उसके पास ज्यादा टैंक, सैनिक और मिसाइलें भी पर्याप्त हैं। चीन की थल सेना में ही 3 कमांड हैं-
  • हल्के वाहनों के जरिए भेजी जा सकने वाली यूनिट
  • भारी-भरकम मशीनों के साथ भेजे जाने वाली टुकड़ी
  • बख्तरबंद गाड़ियों के साथ भेजे जाने वाली यूनिट

ऐसे में चीन ताइवान पर कब्जा करने में कामयाब हो सकता है। कुछ महीने पहले अमेरिकी आर्मी की तरफ से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से जुड़े डॉक्युमेंट्स जारी किए गए थे। इसके मुताबिक, चीनी सरकार 2035 तक अपने सभी पुराने हथियार बदलना चाहती है।

ताइवान पर कब हमला करेगा चीन?
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के एसओएस चाइना इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर प्रो. स्टीव त्सांग कहते हैं- शी जिनपिंग को जिस दिन लगेगा कि वह अमेरिका को हरा सकते हैं, तब ही हमला होगा। युद्ध 2030 से 2035 के बीच कभी हो सकता है। हालांकि, ये चीन के लिए भी खूनी संघर्ष साबित होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके परिणाम सेकेंड वर्ल्ड वॉर से भी ज्यादा खतरनाक होंगे।

किन तरीकों से हमला कर सकता है चीन?

  • समुद्र के रास्ते

चीन अपनी नेवी का फायदा उठाते हुए समुद्र के रास्ते ताइवान पर हमला कर सकता है। चीन की नेवी के पास 360 कॉम्बेट शिप हैं। अमेरिका के पास 300 से कम हैं। चीन के पास एडवांस मर्चेंट फ्लीट और कोस्ट गार्ड भी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीनी सेना के पास कुछ ऐसे बोट्स भी हैं जो अनऑफिशियली सेना की मदद करती हैं। इनसे सैकड़ों सैनिक को जहाजों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा हजारों टैंक्स, गन, मिसाइलें, बख्तरबंद वाहन, रॉकेट लॉन्चर्स को भी ले जाया जा सकता है।

  • एयर पावर

चीन की एयर फोर्स के पास एडवांस जेट्स हैं। ऐसे में यूक्रेन पर रूसी हमले से सीख लेते हुए चीन, ताइवान पर कब्जा करने के लिए सीधे हवाई हमले करने का ऑप्शन चुनेगा। रूस-यूक्रेन जंग को करीब पांच महीने हो गए हैं, लेकिन रूसी सैनिक यूक्रेन के आधे हिस्से पर भी कब्जा नहीं कर पाए हैं।

वर्ल्ड एयर फोर्स की फ्लाइट ग्लोबल 2022 डायरेक्ट्री के मुताबिक, ताइवान के तुलना में चीन के पास दुनिया से इतर केवल अपने ही क्षेत्र में 1,600 लड़ाकू विमान हैं। जबकि ताइवान के पास सिर्फ 300 लड़ाकू विमान हैं। वहीं, अमेरिका के पास दुनियाभर में मौजूद उसकी सेना के कुल 2,700 विमान हैं।

  • ग्राउंड वॉर

ताइवान के पास लगभग 1,50,000 सैनिक हैं। इन्हें चीनी सैनिकों से मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया है। सबसे पहले तो चीनी सैनिकों को ताइपे के आस-पास सुरक्षित जगह तलाशनी होगी। जिससे वो खुद को डिफेंड करते हुए हमले कर सकें। हालांकि ये कठिन होगा, क्योंकि ताइवान के सैनिक अपनी सरजमीन को अच्छी तरह से जानते हैं। उन्हें हर तरह के बंकर्स और सुरंगों के बारे में जानकारी होगी।

चीन के लिए हमला करना कितना मुश्किल होगा?

  • समुद्र के रास्ते लगभग 117 किलोमीटर की दूरी पार करना चीनी सेना के लिए मुश्किल होगा, क्योंकि समुद्र में हरकत होते देख ताइवान लैंड बेस्ड क्रूज मिसाइल से हमला कर देगा। इसी तरह की मिसाइल से यूक्रेन ने ब्लैक सी में रूस की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण वॉरशिप मस्क्वा को तबाह कर दिया था।
  • ताइवान के लिए वॉरशिप बनाने या खरीदने से ज्यादा आसान क्रूज मिसाइल बनाना या खरीदना होगा। इसलिए ताइवान बड़े पैमाने पर मोबाइल और घातक हथियार बना भी रहा है। इनमें कंधों पर रखकर चलाई जाने वाली मिसाइल शामिल है।
  • चीन के लिए हवाई हमले भी आसान नहीं होंगे। पश्चिमी देश ताइवान को हवा में मार करने वाले हथियार दे रहे हैं। जिनसे बचना मुश्किल है। ऐसे हथियार यूक्रेन को भी दिए जा रहे हैं। यही वजह है कि रूस वहां अब तक कब्जा नहीं कर पाया है।
  • सैनिकों को तैनात करने में भी चीन को भारी लॉजिस्टिक प्रॉब्लम्स फेस करना पड़ेंगी। ऐसा माना जाता है कि हमला करने वाली सेना की तादाद एक के मुकाबले तीन होनी चाहिए।
  • चीनी आर्मी के पास पैराट्रूपर्स नहीं हैं। इसलिए सैनिक सिर्फ जमीन और समुद्र के रास्ते घुस सकते हैं, ये बेहद जोखिम भरा और खतरनाक है।
  • चीन के सैनिकों को बैटलफील्ड एक्सपीरिएंस यानी जमीनी लड़ाई का अनुभव नहीं है। आखिरी बार चीनी सैनिकों ने 1979 में वियतनाम के खिलाफ जंग लड़ी थी। ऐसे में ताइवान पर हमला करने से चीनी सेना के भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। दूसरे और आसान शब्दों में कहें तो वॉर प्रैक्टिस और बैटलफील्ड एक्सपीरिएंस में जमीन-आसमान का फर्क होता है। लद्दाख में भारतीय सैनिकों से मुकाबले के दौरान चीन को इसका बखूबी अंदाजा भी हो गया होगा।

जीत के लिए लंबा रास्ता अपनाएगा चीन
सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी का कहना है कि अगर ताइवान को बचाने के लिए चीन और अमेरिका के बीच जंग छिड़ती है, तो ये कुछ वक्त बाद गतिरोध में बदल जाएगी। ताइवान न्यूज के मुताबिक, चीन ताइवान के नेतृत्व को तेजी से गिराने की कोशिश करेगा। ऐसा करने पर, यह जापान और गुआम में अमेरिकी ठिकानों पर पहले हमला कर देगा। जिसके बाद अमेरिका चीनी बंदरगाहों पर हमला करेगा और अपने सहयोगियों को एकजुट करके जवाब देगा।

ऐसा करके चीन को नए सिरे से ताइवान पर हमला करने का वक्त मिल जाएगा। यानी आधी सेना अमेरिका से लड़ेगी और बाकी सेना ताइवान पर हमले करने के नए मौके तलाशेगी। NBC न्यूज ने वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) के एक्सपर्ट्स का हवाला देते हुए कहा- शुरुआती जंग में बीजिंग और वॉशिंगटन के फायदे में होनी की संभावनाएं कम हैं। ऐसे में ये जंग लंबी खिंचेगी। शायद उसी तरह, जिस तरह हम यूक्रेन-रूस के मामले में देख रहे हैं।