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न्यूयॉर्क टाइम्स से / अमेरिका में जो लोग ठीक हुए, उनके प्लाज्मा से मरीजों का इलाज होगा; एक व्यक्ति के प्लाज्मा से 3 मरीज ठीक हो सकते हैं

चीन में कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक होने के बाद सैकड़ों लोग ब्लड प्लाज्मा डोनेट कर रहे हैं। - फाइल चीन में कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक होने के बाद सैकड़ों लोग ब्लड प्लाज्मा डोनेट कर रहे हैं। - फाइल
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चीन में कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक होने के बाद सैकड़ों लोग ब्लड प्लाज्मा डोनेट कर रहे हैं। - फाइलचीन में कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक होने के बाद सैकड़ों लोग ब्लड प्लाज्मा डोनेट कर रहे हैं। - फाइल

  • चीन के एक मेडिकल जर्नल में छपे आर्टिकल के मुताबिक, संक्रमण से ठीक हुए लोगों के प्लाज्मा से कई मरीज ठीक हुए थे
  • अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने कोरोनावायरस के इमरजेंसी वाले मामलों में प्लाज्मा का प्रयोग करने की मंजूरी दे दी है
  • अमेरिका में कोरोना से ठीक हुए लोग अन्य संक्रमितों की मदद के लिए उत्साहित; कई डॉक्टर इस प्रयोग के समर्थन में नहीं

दैनिक भास्कर

Mar 27, 2020, 08:29 PM IST

न्यूयॉर्क टाइम्स से विशेष अनुबंध के तहत. क्या कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों का ब्लड इस महामारी से लड़ने में मदद करेगा? न्यूयॉर्क के डॉक्टर जल्द ही इसकी टेस्टिंग कोरोना के कारण गंभीर स्थिति में पहुंच चुके मरीजों पर करेंगे। डॉक्टरों का मानना है कि जो भी कोरोना पॉजिटिव अब पूरी तरह ठीक हो चुके हैं, उनका ब्लड एंटीबॉडीज का बड़ा जरिया हो सकता है। ब्लड के प्लाज्मा में एंटीबॉडीज होती हैं। दशकों से इसी प्लाज्मा की एंटीबॉडीज के जरिए संक्रमित बीमारियों को इलाज होता रहा है। इबोला और इनफ्लूएंजा जैसी बीमारी भी इसी प्लाज्मा के जरिए ठीक हुई है।


माउंट सिनाई हॉस्पिटल के प्रेसिडेंट और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर डॉ. डेविड एल. रिक कहते हैं कि, 'जब तक इसकी टेस्टिंग नहीं हो जाती, तब तक यह कहना मुश्किल है कि यह कितना कारगर होगा। हॉस्पिटल में भर्ती किए गए और सांस में दिक्कत वाले किसी सामान्य मरीज पर इसकी टेस्टिंग हो सकती है। लेकिन, वे मरीज जो बेहद गंभीर स्थिति में पहुंच चुके हैं, उन पर यह प्रयोग नहीं करना चाहिए। सही समय पर सही मरीज चुनकर ही इसका टेस्ट किया जाना चाहिए।'


न्यूयॉर्क ब्लड सेंटर ही प्लाज्मा इकट्ठा करने और उसे बांटने का काम करेगा

न्यूयॉर्क ब्लड सेंटर के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. ब्रूस साचेज कहते हैं, ‘मंगलवार को अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने कोरोनावायरस के इमरजेंसी वाले मामलों में प्लाज्मा का प्रयोग करने की मंजूरी दी और इसके ठीक बाद न्यूयॉर्क के हॉस्पिटल इस प्रयोग में हिस्सा लेने के लिए कहने लगे।’ 


डॉ. साचेज ने बताया, 'हमारी पहली कोशिश यही है कि जल्द से जल्द हॉस्पिटलों को अपने मरीजों का इलाज करने के लिए यह प्रोडक्ट मिल सके।' वे बताते हैं, ‘हमारे पास न्यू इंग्लैंड, डेलावेयर और मिडवेस्ट में भी ब्लड सेंटर हैं, इसलिए हम बाकी क्षेत्रों में भी यह काम कर सकते हैं। हम अन्य ब्लड सेंटर और अस्पतालों के साथ भी काम कर रहे हैं, जो ब्लड इकट्ठा करने और ऐसा करने में सक्षम हैं। हम पूरे देश की मदद करने के लिए न्यूयॉर्क में पर्याप्त प्लाज्मा इकट्ठा नहीं कर सकते इसलिए हम देशभर के अन्य ब्लड सेंटर के साथ यह साझा करना चाहते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा जगहों पर यह सुविधा मिल सके।'

अमेरिका में बार और रेस्टोरेंट पूरी तरह खाली हैं। फोटो वेस्ट ऑरेंज स्थित एक बार की है।

डोनर का चुनाव भी सावधानी से करना होगा

डॉ. रिक कहते हैं कि ‘वो मरीज जो बीमारी के दौरान कोरोना पॉजिटिव पाया गया हो, फिर ठीक हुआ हो। इसके बाद अगले 14 दिनों तक उसमें कोरोना के किसी तरह के लक्षण नहीं दिखाई दिए हों। अब उसकी रिपोर्ट पूरी तरह नेगेटिव हो। साथ ही उसके प्लाज्मा में कोरोना से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज का लेवल भी अच्छा हो। ऐसे ही लोगों का चुनाव प्लाज्मा डोनेट करने के लिए होगा। टेस्टिंग में देरी और कमी के कारण ऐसे लोगों की संख्या शुरुआत में कम ही रहेगी।


डोनर के एक हाथ से ब्लड निकाला जाएगा, प्लाज्मा निकालकर दूसरे हाथ से ब्लड फिर चढ़ा दिया जाएगा

डॉ. साचेज कहते हैं, 'जो भी लोग प्लाज्मा डोनर के क्राइटेरिया को पूरा करेंगे, उन्हें ब्लड सेंटर भेजा जाएगा। यह ब्लड डोनेट करने जैसी ही प्रक्रिया होगी, बस अंतर यह होगा कि मरीज के शरीर से निकाला गया ब्लड एक मशीन से गुजरेगा, जहां इसके प्लाज्मा को अलग कर लिया जाएगा और लाल व सफेद रक्त कोशिकाएं फिर से ब्लड डोनर के शरीर में पहुंचा दी जाएंगी। डोनर के दोनों हाथों में सुई लगी होगी। एक हाथ से ब्लड निकाला जाएगा, यह मशीन से गुजरेगा और दूसरे हाथ से वापस यह डोनर के शरीर में पहुंचा दिया जाएगा। यह प्रक्रिया 60 से 90 मिनट लेगी। 


साचेज कहते हैं, 'एक मरीज से इतना प्लाज्मा मिल जाएगा कि तीन अन्य मरीज ठीक हो सकें। इससे डोनर को कोई नुकसान नहीं होगा, कोरोना से लड़ने के लिए उसके शरीर में पर्याप्त एंटीबॉडीज बनती रहेंगी। डोनर के शरीर से सिर्फ 20% एंटीबॉडीज ली जाएगी जो 2-4 दिनों में ही उसके शरीर में फिर से बन जाएंगी।’

अमेरिका में डॉक्टर्स के मुताबिक, एक मरीज से मिला प्लाज्मा तीन मरीजों को ठीक कर सकता है।

एक कोरोना संक्रमित मरीज के ब्लड में एक कप के बराबर प्लाज्मा पहुंचाया जाएगा

कोरोना संक्रमित मरीज के ब्लड में एंटीबॉडीज वाला प्लाज्मा देने से पहले इसका टेस्ट भी होगा। यह देखा जाएगा कि प्लाज्मा में हेपेटाइटिस या एचआईवी जैसी बीमारियां या ऐसे प्रोटीन जो रोग प्रतिरोध क्षमता को कमजोर करें वह तो नहीं हैं? अगर प्लाज्मा हर टेस्ट में पास होता है तो फिर इसे तुरंत यूज किया जा सकता है या इसे स्टोर (फ्रोजन) भी किया जा सकता है। कोरोना संक्रमित के हर मरीज को एक यूनिट प्लाज्मा दिया जाएगा, यह लगभग एक कप के बराबर होगा। इसे ब्लड की तरह ही मरीज के शरीर में पहुंचाया जाएगा। ब्लड के मामले में डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप एक जैसा होना चाहिए, लेकिन प्लाज्मा के मामले में यह जरूरी नहीं होगा।

साचेज कहते हैं, 'हमे लगता है कि यह कोरोना संक्रमित कुछ मरीजों के लिए यह एक बेहतर इलाज हो सकता है, लेकिन वास्तव में अब तक हम कुछ नहीं जानते। उम्मीद है अगले कुछ हफ्तों में हम इससे जुड़ा डेटा हासिल कर पाएंगे। पहले मरीज पर हुए प्रयोग के परिणाम सही दिशा में हैं या नहीं, यही आगे की योजना का आधार बनेगा।

चीन में ज्यदातर मरीज इसी तरह ठीक हुए 

डॉ. साचेज कहते हैं, 'हमारी उम्मीदें उन रिपोर्ट्स पर आधारित हैं, जिनमें चीन के ज्यादातर मरीजों को इसी तकनीक से ठीक होने की बात सामने आई है, जो भी लोग ठीक हुए, उनके प्लाज्मा में एक महीने के अंदर अच्छी संख्या में एंटीबॉडीज बन जाती है। एक जर्नल में छपे आर्टिकल के मुताबिक, चीन में प्लाज्मा के एक-एक यूनिट से 10 मरीजों के पूरी तरह ठीक होने की बात कही गई थी।’

वुहान ब्लड सेंटर में कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक होने के बाद प्लाज्मा डोनेट करने आया एक शख्स।

एक रिसर्चर कहते हैं कि कोरोना पॉजीटिव होने के बाद जीवित बचे लोगों के प्लाज्मा को कोरोना संक्रमितों को ठीक करने के उपयोग के समर्थन में पर्याप्त सबूत हैं। टेक्सास मेडिकल ब्रांच यूनिवर्सिटी के वायरलोजिस्ट विनित मेनाकरी बताते हैं, 'चार से आठ सप्ताह के अंदर इनके ब्लड में एंटीबॉडीज की पर्याप्त मात्रा हो जानी चाहिए, जो कि वायरस को पूरी तरह निष्क्रिय कर देगा या ये कहें कि संक्रमण को थाम देगा।' चूहों पर हुए एक प्रयोग के आधार पर वे कहते हैं, ‘अगर आप वायरस के बढ़ने की गति को 10 से 100 गुना तक कम कर सकते हैं तो यह जीने और मरने के बीच अंतर पैदा कर सकता है।’ 


एक संभावित खतरा यह भी

विनीत यह भी बताते हैं कि, ‘अच्छी मात्रा में एंटीबॉडीज वाले डोनर अच्छी संख्या में मिल जाते हैं तो कोरोना से लड़ने का यह एक प्रभावी तरीका बन जाएगा। इसमें एक संभावित जोखिम भी है। अगर मरीज का इम्यून सिस्टम डोनर के प्लाज्मा के किसी तत्व के विरोध में प्रतिक्रिया करता है, तो इससे उसके अन्य किसी बीमारी से पीड़ित होने की संभावना रहेगी। हॉस्पिटल रोगियों का इलाज करने से पहले उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करेंगे। प्रक्रिया एक प्रयोग के तौर पर बिल्कुल नहीं होगी।


सवाल: यह बीमारी से लड़ने का कोई उपाय है या नया प्रयोग करने का मौका?

डॉ. रिक कहते हैं, 'अभी लोग बहुत बीमार हैं, इस प्रयोग का यह सही समय नहीं है। लोग अस्पताल में हैं, वेंटिलेटर पर लेटे हुए हैं।’ वे यह भी कहते हैं कि, ‘अगर कोई स्टीम रोलर आपकी ओर बढ़ रहा है तो आप निष्क्रिय होकर नहीं बैठना चाहेंगे। आप इससे लड़ने की कोशिश में जल्द से जल्द सारे उपाय अपनाएंगे। इन उपायों से मदद भी मिल सकती है और नुकसान भी बहुत हो सकता है। इन सब के बीच हमें यह जानना होगा कि यह उपया बीमारी से लड़ने के लिए अपनाया जा रहा है या इसे अलग-अलग चीजों को आजमाने का एक मौका माना जा रहा है? 


कोरोना से ठीक हुए लोग मदद करने के लिए उत्साहित

डॉ. साचेज कहते हैं, 'जो लोग कोरोना के संक्रमण से ठीक हो गए हैं, वे मदद के लिए उत्साहित हैं। हमें ऐसे कई निवेदन मिल रहे हैं। एक सेंटर ने मरीजों पर सर्वे कराया, जिसमें सैकड़ों लोगों ने प्लाज्मा डोनेट करने की इच्छा जताई। यह कोशिश लोगों को एक साथ लेकर आएगी। जो लोग इस महामारी से बच रहे हैं वो अपने बाकी साथियों को भी इससे उबारना चाहते हैं।'

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