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हर टीके पर सबका हक:वैक्सीन से जुड़े पेटेंट सस्पेंड करने के भारतीय प्रस्ताव पर अमेरिका तैयार

वॉशिंगटन/नई दिल्ली2 महीने पहले
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वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने किया यूएस के फैसले का विरोध, कहा-सस्ते टीकों की नहीं जाली टीकों के निर्माण की राह खुलेगी। - Dainik Bhaskar
वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने किया यूएस के फैसले का विरोध, कहा-सस्ते टीकों की नहीं जाली टीकों के निर्माण की राह खुलेगी।
  • यूरोपीय संघ भी विचार करेगा, डब्ल्यूटीओ में सहमति बनी तो सभी देशों को मॉडर्ना और फाइजर जैसे टीके भी कम दाम पर मिल पाएंगे

दुनिया के हर देश तक वैक्सीन पहुंचाने की दिशा में गुरुवार को एक बड़ा कदम अमेरिका ने उठाया है। कोरोना वैक्सीन के डेवलपमेंट व निर्माण से जुड़े सभी पेटेंट्स को फिलहाल सस्पेंड करने के भारत व दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव पर अमेरिका ने सहमति दे दी है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में यह प्रस्ताव भारत और दक्षिण अफ्रीका ने पिछले साल रखा था।

अमेरिकी सरकार की इस घोषणा के बाद यूरोपीय संघ (ईयू) ने भी कहा है कि वह प्रस्ताव पर विचार करेगा। यदि डब्ल्यूटीओ में यह प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो वैक्सीन निर्माता निजी कंपनियों को भी अपनी तकनीक और रिसर्च अन्य कंपनियों से साझा करनी होगी। सैद्धांतिक तौर पर यह माना जाता है कि ऐसा करने से न सिर्फ हर वैक्सीन के ज्यादा डोज का उत्पादन सुनिश्चित होगा बल्कि ज्यादा निर्माता कंपनियां होने से गरीब देशों को भी सक्षम वैक्सीन सस्ते दाम पर मिल पाएगी।

यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड्स रिप्रेंजेटेटिव कैथरिन टाय ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन के मत से मीडिया को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि यह पूरे विश्व के लिए बहुत मुश्किल वक्त है। इन विशेष परिस्थितियों में विशेष कदम ही उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका हमेशा ही बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा में विश्वास रखता है, मगर जब पूरी दुनिया एक महामारी से जूझ रही हो तो हमें कुछ समय के लिए ये अधिकार छोड़ने होंगे। हालांकि सिर्फ अमेरिका या ईयू के मान जाने से पेटेंट्स सस्पेंड नहीं हो जाएंगे। पेटेंट्स हासिल करने वाली निजी कंपनियां पहले ही बाइडेन प्रशासन के इस फैसले को निराशाजनक बता चुकी हैं। कंपनियों का कहना है कि इस कदम से सस्ते टीके की नहीं जाली वैक्सीन के निर्माण की राह खुल जाएगी। माना जा रहा है कि कंपनियां इसके खिलाफ कोर्ट भी जा सकती हैं।

भास्कर एक्सप्लेनर

5 सवालों से समझिए हर पहलू

1 पेटेंट अधिकार क्या है और अमेरिका या किसी भी देश का इससे क्या संबंध है?
कोई भी व्यक्ति या कंपनी किसी उत्पाद का विकास अपनी रिसर्च पर करती है तो उसे वह अपनी बौद्धिक संपदा बताते हुए उसका पेटेंट लेती है। यानी वह उत्पाद और उसे बनाने की विधि का इस्तेमाल कोई भी कंपनी की अनुमति के बिना नहीं कर सकता। अक्सर बड़ी कंपनियों की रिसर्च में सरकारें शामिल होती हैं या उनके उत्पादों की ट्रेड डील में हित जुड़े होते हैं। अत: कोई भी सरकार अपने देश की कंपनियों के पेटेंट्स को लेकर मुखर होती है।
2 अमेरिका के पेटेंट अधिकार छोड़ने से हमें क्या फायदा?
अमेरिका एक शक्तिशाली देश है। मॉडर्ना की वैक्सीन रिसर्च में अमेरिकी सरकार भी शामिल रही है। फाइजर ने भी इस रिसर्च का इस्तेमाल किया है। यदि अमेरिका पेटेंट अधिकार छोड़ता है तो बाकी देशों पर भी इसका दबाव बढ़ेगा। डब्ल्यूटीओ में अगर इस पर सहमति बनती है तो निजी वैक्सीन निर्माता कंपनियों को अपनी तकनीक और रिसर्च सार्वजनिक करनी होगी। कोई भी कंपनी इसी आधार पर वैक्सीन का निर्माण कर सकेगी।
3 क्या मॉर्डना के फॉर्मूले पर हम भी वैक्सीन बना लेंगे?
ये इतना आसान नहीं है। डब्ल्यूटीओ में सर्वसम्मति बनना बहुत मुश्किल है। बन भी जाए तो इसमें वैक्सीन निर्माता निजी कंपनियों को नुकसान है। वैक्सीन निर्माण का एकाधिकार और रिसर्च के इस्तेमाल की अनुमति पर लाइसेंस फीस ही कंपनियों के मुनाफे के स्रोत हैं। डब्ल्यूटीओ में सहमति बन भी गई तो वैक्सीन कंपनियों के पास कोर्ट जाने का विकल्प रहेगा। कंपनियां कोर्ट गईं तो मामला उलझ जाएगा।

4 वैक्सीन कंपनियों का विरोध के पीछे क्या तर्क है?
वैक्सीन कंपनियों का कहना है कि सिर्फ फॉर्मूला सार्वजनिक कर देने से कोई भी वैक्सीन निर्माण में सक्षम नहीं हो जाएगा। यदि सभी वैक्सीन बनाने लगेंगे तो कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित होगी, टीकों का निर्माण धीमा हो जाएगा। सिर्फ फाइजर की वैक्सीन में 19 देशों के 86 निर्माताओं के 280 कंपोनेंट्स का इस्तेमाल होता है। एक तर्क ये भी है कि पेटेंट अधिकार छोड़ने की परंपरा शुरू हुई तो अगली महामारी में वैक्सीन बनाने में ही निजी कंपनियां रुचि नहीं लेंगी।
5 क्या भारत भी अमेरिका जैसा कदम उठा सकता है?
भारत में अभी एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन का उपयोग हो रहा है। कोविशील्ड पर पेटेंट ऑफ करने का अधिकार भारत सरकार के पास नहीं है क्योंकि इसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में विकसित किया गया है। भारतीय कंपनी सीरम सिर्फ प्रोडक्शन कर रही है। कोवैक्सीन तो भारत बायोटेक औरआईसीएमआर ने ही िमल कर विकसित की है। कोवैक्सीन पर सरकार का अधिकार है और इसका पेटेंट ऑफ किया जा सकता है।

पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव से बातचीत व न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट पर आधारित।

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