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इस साल भी 'बाहरी' को हज के लिए न:महामारी, युद्ध, राजनीति की वजह से प्रभावित होता रहा है हज, हैजा फैलने पर उस्मानिया सल्तनत में लोग क्वारैंटाइन किए गए थे

2 महीने पहलेलेखक: साजिद शेख
मक्का की 1887 में ली गई तस्वीर।

साल 2021 का हज सऊदी अरब के 60 हजार लोग ही अदा करेंगे। सऊदी सरकार ने बाहरी देशों के लोगों को हज यात्रा की इजाजत नहीं दी। ऐसा पहली बार नहीं, जब हज यात्रा को सीमित रखा गया। पहले भी युद्ध, राजनीतिक कशमकश और महामारी की वजह से हज या तो निरस्त होता रहा है या फिर इसे सीमित लोगों ने अदा किया।

जानें, कब-कब नहीं हो सका हज

865: अराफात पर कत्लेआम
इस्माइल बिन यूसुफ, जिसका एक नाम अल-सफाक भी था, ने सन 865 में बगदाद की अब्बासी सल्तनत के खिलाफ जंग की घोषणा कर दी। अल-सफाक ने फौज के साथ मक्का में अराफात के पहाड़ पर चढ़ाई कर दी। हजारों हज यात्रियों का कत्लेआम किया। हमले की वजह से इस साल हज नहीं हो सका।

930: करामतिन का हमला
मक्का शहर पर यह सबसे घातक हमला था। सन 930 में पूर्वी अरब (अब बहरीन) के करामतिन कबीले ने मक्का में कत्लेआम और लूटमार की। करामतिन काबिले के मुखिया अबु ताहिर अल जनाबी ने हजारों लोगों की लाशें खाना-ए-काबा के करीब जम-जम (पवित्र पानी) के कुएं में फिंकवा दीं।

सऊदी अरब में स्थापित शाह अब्दुल अजीज फाउंडेशन फॉर रिसर्च एंड आर्काइव्स की रिपोर्ट के मुताबिक हमले में करीब 30 हजार लोग मारे गए। इस साल करामतिन के डर की वजह से हज नहीं हो सका।

हमलावर हजरे असवद (ब्लैक स्टोन) को भी उखाड़कर साथ ले गए। हजरे असवद अबु ताहिर के पास उसके शहर अल-अहसा में कई साल रहा। अंत में करीब 20 साल बाद फिरौती की एक बड़ी रकम के बाद इसे वापस खाना-ए-काबा में लाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, करामतिन इस्लामी रियासत को नहीं मानते थे। करामतिन समझते थे कि हज में किए जाने वाले कार्य इस्लाम से पहले के हैं। मूर्ति पूजा की श्रेणी में आते हैं।

जम-जम कुएं की पुरानी तस्वीर। - फाइल
जम-जम कुएं की पुरानी तस्वीर। - फाइल

983: अब्बासी और फातिमी खिलाफतों में झगड़े
बात साल 983 की। हज इस बार राजनीति की भेंट चढ़ा। इराक की अब्बासी और मिस्र की फातिमी खिलाफतों के बीच राजनीतिक गहमागहमी चरम पर थी। मुसलमानों को हज यात्रा नहीं करने दी गई। इसके बाद हज 991 में अदा किया गया।

जब बीमारी-महामारी ने हज में डाली बाधा

  • शाह अब्दुल अजीज फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, साल 968 में अल-माशरी नाम की बीमारी फैली। मक्का में बड़ी तादाद में लोग मारे गए। बहुत से हज यात्री रास्ते में ही मर गए। कुछ मक्का पहुंचे भी, तो हज की तारीख निकलने के बाद।
  • साल 1831 में हैजे के प्रकोप से मक्का में लगभग तीन-चौथाई श्रद्धालु मारे गए। 1846 में 15 हजार लोगों की मौत हो गई। महामारी मक्का में 1850 तक फैलती रही। इसके बाद भी कुछ लोग मारे गए। हैजे की वजह से 1837 से लेकर 1858 में 2 दशकों में 3 बार हज को रद्द करना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं के अनुसार यह महामारी भारत से आए हज यात्रियों के जरिए फैली थी। उस्मानिया सल्तनत (ऑटोमन एम्पायर) के इस दौर में महामारी के खात्मे के लिए लोग क्वारैंटाइन किए गए थे।

मौसम-महंगाई की मार, डाकुओं का डर

  • साल 1000 और इसके आसपास महंगाई और और हज यात्रा के खर्च में बहुत ज्यादा वृद्धि की वजह से आर्थिक रूप से कमजोर लोग हज पर नहीं जा सके। 1039 में इराक और खुरासान से लेकर शाम और मिस्र के लोग हज पर नहीं जा सके।
  • 1026 को इराक में बहुत अधिक सर्दी और बाढ़ की वजह से श्रद्धालु मक्का की यात्रा नहीं कर सके। ठंडे मौसम की वजह से हज को रद्द करना पड़ा था।
  • साल 1099 में मुस्लिम दुनिया की आपसी जंगों की वजह से मुसलमानों को बहुत नुकसान हुआ। इसका असर हज यात्रा पर भी पड़ा।
  • 1256 से 1260 तक हिजाज के अलावा किसी और देश से हाजी मक्का नहीं पहुंचे।
  • 1798 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान हज के काफिलों को सुरक्षा की वजह से रोक दिया गया।
  • 1925 में खाना-ए-काबा के गिलाफ किस्वह को मिस्र से सऊदी अरब लेकर जाने वाले काफिले पर हमला हो गया। मिस्र का कोई हाजी हज नहीं कर सका।
1910 की तस्वीर। उस्मानिया सल्तनत के दौर में काबे को किस्वह से ढांका जा रहा है। -फाइल
1910 की तस्वीर। उस्मानिया सल्तनत के दौर में काबे को किस्वह से ढांका जा रहा है। -फाइल

इबोला का असर

  • 2010 की शुरुआत में इबोला का प्रकोप चरम पर था। दुनिया भर के देशों ने कई पश्चिमी अफ्रीकी राज्यों के लिए वीजा जारी करना बंद कर दिए। 2014 में सऊदी अरब ने भी अस्थायी रूप से गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन के नागरिकों के लिए उमराह और हज के वीजा जारी नहीं किए।
  • पैगंबर मोहम्मद के नेतृत्व में हज पहली बार 629 (6 हिजरी - इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से) में किया गया था। जब से सऊदी अरब अस्तित्व में आया, यानी 1932 से लेकर अब तक, खाना-ए-काबा में हज पूरी तरह कभी नहीं रुका।
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