यूक्रेन में फंसे भारतीय स्टूडेंट्स LIVE:विदेश मंत्रालय ने मदद के लिए डेडिकेटेड ट्विटर हैंडल बनाया, यूक्रेन से लगे 4 देशों में खोले कंट्रोल रूम

नई दिल्लीएक वर्ष पहले

यूक्रेन में रूस की बमबारी के बीच हजारों भारतीय छात्र यूक्रेन के विभिन्न शहरों में फंसे हैं और घर वापसी की जद्दोजहद में लगे हैं। कीव में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए यूक्रेन सरकार ने फ्री ट्रेन चलाने का फैसला लिया है। ये ट्रेनें यात्रियों को देश के पश्चिमी क्षेत्रों में ले जाएंगी, जहां युद्ध की स्थिति नहीं है। पोलैंड सरकार ने कहा है कि भारतीयों को बिना वीजा पोलैंड में एंट्री दी जाएगी।

इधर, कीव में इंडियन एम्बेसी से लगे स्कूल में शरण लिए स्टूडेंट्स भूख से बेहोश हो रहे हैं। 13 छात्रों की तबीयत बिगड़ी है। स्टूडेंट्स का आरोप- हमले वाले शहरों में स्टूडेंट्स को मदद नहीं मिली, जिन्हें रेस्क्यू किया वे सुरक्षित जगहों पर थे।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि यूक्रेन से भारतीयों को निकालने में सहायता के लिए अलग से opGanga Helpline के नाम से एक डेडिकेटेड ट्विटर हैंडल (@opganga) बनाया गया है।

यूक्रेन से भारतीयों को निकालने के लिए डैडीकेटेड ट्विटर हैंडल।
यूक्रेन से भारतीयों को निकालने के लिए डैडीकेटेड ट्विटर हैंडल।

एम्बेसी की एडवायजरी- कर्फ्यू हटते ही पश्चिमी इलाकों में जाएं भारतीय

एंडियन एम्बेसी ने आज एक एडवायजरी जारी कर भारतीयों से कहा है कि कीव में जैसे ही कर्फ्यू हटे और लोगों की आवाजाही शुरू हो, भारतीय करीब के रेलवे स्टेशन पहुंचें और यूक्रेन के पश्चिमी इलाके की ओर जाएं। रेल से सफर सुरक्षित है, ट्रेनें चल रही है। सभी भारतीय समूह में निकलें। कोई अकेला निकलता है तो वह भारतीय की पहचान कर उसके साथ हो जाए।

विदेश मंत्रालय ने फंसे भारतीयों की मदद के लिए यूक्रेन से लगे चार देशों पोलैंड, रोमानिया, हंगरी और स्लोवाक रिपब्लिक में कंट्रोल रूम बनाए हैं। ये चौबीस घंटे काम करेंगे। इनके नंबर और ईमेल एड्रेस भी जारी किए गए हैं।

भास्कर ने यूक्रेन में फंसे भारतीयों से बात की...

मध्यप्रदेश की छात्रा की रिपोर्ट
टीकमगढ़ की स्टूडेंट बोलीं- अभी जिन्हें निकाला वे सुरक्षित शहरों में थे, हमें मदद नहीं मिल रही

टीकमगढ़ की दिव्यांशा साहू। (लाल स्वेटर में)
टीकमगढ़ की दिव्यांशा साहू। (लाल स्वेटर में)

MP के टीकमगढ़ की दिव्यांशा साहू ने बताया- यूक्रेन के कीव और खार्किव में फंसे इंडियन स्टूडेंट काफी डरे हुए हैं। जान बचाने के लिए बंकर और अंडर ग्राउंड मेट्रो स्टेशन में छिपे हुए हैं। इंडियन एम्बेसी हमें हमले वाले इलाकों से सुरक्षित बाहर निकाले। अभी तक जिन स्टूडेंट्स को निकाला गया है वे सुरक्षित शहरों में रहते थे। रूस के हमले वाले शहरों में रह रहे स्टूडेंट्स तक मदद नहीं पहुंची है।ॉ

इंदौर का शुभम बोला प्लीज हेल्प कीजिए, 20 घंटे से खुले में बैठे हैं

इंदौर के शुभम ने बताया कि यहां रोमानिया बॉर्डर पर करीब 400 इंडियन स्टूडेंट्स बॉर्डर पार करने के लिए बैठे हैं। इंडियन एम्बेसी हमें बॉर्डर पार नहीं करवा रही है। हमें यहां खुले में बिना किसी सुरक्षा के बैठे हुए 20 घंटे से ज्यादा वक्त हो चुका है। यहां का तापमान -6 डिग्री है और इस बॉर्डर चेक पोस्ट पर सिर्फ एक फूड आउटलेट है, जहां खाना खत्म हो चुका है। हमें अर्जेंट हेल्प की जरुरत है। प्लीज हमारी मदद कीजिए।

ROMANIA बॉर्डर पर फंसे MP के स्टूडेंट बोले; प्लीज हेल्प

राजस्थान के छात्रों की रिपोर्ट

भारी बमबारी के बीच रेलवे स्टेशन गए, ट्रेन में नहीं बैठाया तो वापस आते वक्त आर्मी ने घेरा

सीकर की डॉ. श्रद्धा चौधरी ने बताया- यूक्रेन में फंसे छात्रों को अब सिर्फ जंग के हालातों से ही नहीं, भूख-ठंड और बीमारी से भी लड़ना पड़ रहा है। कीव में एम्बेसी से सटे स्कूल में शरण लिए कई बच्चे भीषण ठंड और भूख के मारे बेहोश हो गए हैं। हमें सोए हुए 5 दिन हो गए हैं। 3 दिन से ठीक से खाना नहीं खा पाए हैं। ठंड के मारे 13 लोग बेहोश हो गए हैं।

कई लोगों को बार-बार पैनिक अटैक आ रहा है। कई लोग बीमार पड़ गए हैं। हमारे पास दवाइयां भी नहीं है। एम्बेसी ने हमसे कहा कि रेलवे स्टेशन पर जाएं। करीब 300 बच्चे कीव के रेलवे स्टेशन गए। 60 बच्चे तो किसी तरह यूक्रेन के वेस्टर्न हिस्से में पहुंच गए, लेकिन कई लोगों को ट्रेन में नहीं बैठाया गया। जब स्टूडेंट्स को ट्रेन नहीं मिली और वे वापस एम्बेसी जाने लगे तो बीच रास्ते में यूक्रेन आर्मी ने उन्हें रोककर उन पर बंदूक तान दी।

जब वे वापस एम्बेसी आए तो घुसने से मना कर दिया गया। एम्बेसी जबरन उन्हें शेल्टर होम से बाहर भेजने की कोशिश कर रही है।

खार्किव में भारतीय छात्र दो दिन से भूखे-प्यासे

रूसी सेना यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खार्किव में दाखिल हो गई है। बीकानेर के बंगला नगर निवासी मेडिकल छात्र विवेक सोनी इस समय खार्किव मेट्रो स्टेशन पर फंसे हुए हैं। पिछले चार दिन से न सिर्फ विवेक बल्कि तीन हजार भारतीय यहां फंसे हुए हैं। विवेक का कहना है कि छात्रों के पास खाना भी खत्म हो गया। दो दिन से भूखे ही मेट्रो स्टेशन में बैठे हैं।

स्टूडेंट वापस भारत जाने के लिए सहायता मांग रहा है, लेकिन दूतावास के अधिकारी कह रहे हैं कि उन्हें रोमानिया तक आना पड़ेगा। 1200 से 1500 किलोमीटर की दूरी बम धमाकों के बीच स्टूडेंट्स को अपने स्तर पर तय करना होगा। छात्र ये सफर कैसे तय करेंगे, इसका जवाब दूतावास के पास भी नहीं है।

इंडियन एम्बेसी के पास बचाने का कोई प्लान नहीं, छात्र बोले-नहीं पहुंच सकते पोलैंड बॉर्डर

राजस्थान के श्रीगंगानगर के दुष्यंत और चूरू के विजय ने बताया- यूक्रेन-रूस बॉर्डर के सबसे नजदीकी शहरों में से एक सुमी में करीब एक हजार इंडियन स्टूडेंट फंसे हैं। यह शहर अब पूरी तरह से रूसी मिलिट्री के कब्जे में है और यहां से कीव जाने के सभी रास्ते बंद हो गए हैं। हमसे कहा गया है कि पोलैंड बॉर्डर की तरफ जाएं। सुमी से पोलैंड बॉर्डर की दूरी 1230 किलोमीटर है।

ऐसे में उन्हें पहले कीव जाना होगा और फिर वहां से बॉर्डर। लेकिन कीव तक के पूरे रास्ते में लड़ाई हो रही है और उन्हें फाइटर जेट और टैंकों के बीच से जाना होगा। इस कारण वहां जाना संभव नहीं है। ऐसे में सभी स्टूडेंट‌्स ने बंकर में शरण ले रखी है।

सुमी शहर से रूस के बॉर्डर की दूरी केवल 35 किलोमीटर है। वे पैदल ही रूस का बॉर्डर क्रॉस करने को तैयार हैं। इसलिए उन्हें इस बॉर्डर से सरकार को निकालना चाहिए। इंडियन एम्बेसी ने पोलैंड, हंगरी, स्लोवाक रिपब्लिक और रोमानिया से स्टूडेंट को निकालने की प्लानिंग बनाई है, लेकिन यहां के स्टूडेंट को निकालने का कोई प्लान नहीं है।

बिहार के छात्र की रिपोर्ट
माइनस 1 डिग्री में 40 किलोमीटर चला पैदल

बिहार के भागलपुर में रहने वाले शुभम्।
बिहार के भागलपुर में रहने वाले शुभम्।

भागलपुर के शुभम् पैदल ही पोलैंड के लिए निकल पड़े। टरनोपिल से पोलैंड बॉर्डर की यात्रा शुभम् के लिए आसान नहीं थी। पोलैंड के लिए 40 किलोमीटर वे पैदल चले। शुभम् ने बताया कि जैसे ही पता चला कि यहां से पौलेंड की ओर निकलना है। सुबह 4:30 बजे से प्राइवेट गाड़ी से वह पोलैंड की ओर निकल पड़े।

लेकिन, बार्डर से 40 किलोमीटर पहले से गाड़ियों की लंबी लाइन लगी थी। इस कारण गाड़ी वाले ने आगे जाने से मना कर दिया, इसलिए वे पैदल ही निकल गए।

पंजाब के छात्रों की रिपोर्ट
माइनस 2 डिग्री में बिस्किट के सहारे पैदल लंबा सफर, भारी मुसीबतों का सामना कर पोलैंड, हंगरी और रोमानिया की सीमाओं पर पहुंच रहे

पोलैंड की तरफ पैदल सफर तय करते स्टूडेंट।
पोलैंड की तरफ पैदल सफर तय करते स्टूडेंट।

पालटोवा यूनिवर्सिटी में बिजनेस मैनेंजमेंट के छात्र कपूरथला के अकर्ष ढींगरा ने बताया- कड़ाके की ठंड, हर तरफ बर्फ और माइनस दो डिग्री तापमान में भारत आने के लिए यूक्रेन के बॉर्डर वाले इलाके में जा रहे हैं। ठंड के कारण उनके पांव तक खराब हो गए हैं, लेकिन फिर भी अपने साथियों के साथ कीव से निकल नाटो क्षेत्र अलवीव की तरफ निकले हैं।

उन्होंने कहा कि वहां पर भारतीय दूतावास किसी तरह की कोई मदद नहीं कर रहा है। बिस्किटों के सहारे छात्र अपना सफर कर रहे हैं।

होशियारपुर के गुरभेज सिंह भूंदड़ ने बताया कि वे यूक्रेन के ओडेसा शहर में मैनेजमेंट कोर्स कर रहे हैं। जिस बिल्डिंग में वह रहते थे उसे तबाह कर दिया गया। वहां की सेना ने उन्हें बेसमेंट में रखा और कहा कि बाहर नहीं निकलना है, लेकिन उसे और उसके दो साथियों को लगा कि यहां पर वह सुरक्षित नहीं है। इसलिए वह वहां से अपना सामान लेकर निकल आए।

पोलैंड सीमा यहां से साढ़े सात सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन अभी तक वह सिर्फ करीब पचास किलोमीटर का सफर ही तय कर पाए हैं। टैक्सी वाले 300 डॉलर मांग रहे हैं, जबकि वह रात में एक चर्च में रुककर अब ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं।

हरियाणा के छात्रों की रिपोर्ट
पासपोर्ट गुम होने पर रोहतक का छात्र परेशान, बोला- अगर एम्बेसी हमारे साथ ऐसा करेगी, तो कौन बचाएगा

यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों ने एक बंकर में रात काटी। इनमें रोहतक का मोहित भी है।
यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों ने एक बंकर में रात काटी। इनमें रोहतक का मोहित भी है।

यूक्रेन-रूस युद्ध के बीच यूक्रेन की राजधानी कीव में फंसे छात्रों के सामने एक और नई समस्या आ गई है। ज्यादातर के पासपोर्ट अब गुम हो चुके हैं। रोहतक के मोहित ने बताया है कि कीव में एयर स्ट्राइक से पहले ही वह और उनके कई दोस्त सूमी शहर में आ गए थे। पासपोर्ट गुम न हों, इसलिए उन्हें वहीं कीव में अपनी मेडिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में छोड़ आए थे।

अब वहां लगातार हमले हो रहे हैं, ऐसे में पता भी नहीं है कि उनके दस्तावेज या फिर हॉस्टल का भी वजूद बचा होगा या नहीं।

एम्बेसी बोली पुलिस में शिकायत करो

वहां जाना खतरे से खाली नहीं होगा। मोहित ने बताया है कि पासपोर्ट गुम होने वाले छात्रों से एम्बेसी बोल रही है कि शुल्क देकर एक फार्म भर दो, उसके बाद पुलिस में शिकायत दो फिर एम्बेसी देखेगी कि इस मामले में क्या किया जा सकता है। मोहित का कहना है कि ऐसे समय में एम्बेसी का यह रवैया ठीक नहीं है।

डिजीटल जमाना है। हम सभी छात्रों के पास दस्तावेजों के नंबर और पीडीएफ हैं तो एम्बेसी उन्हें चेक क्यों नहीं कर लेती।

नेहा ने भारत लौटने से इनकार कर दिया

हरियाणा की नेहा ने कीव में एक कंस्ट्रक्शन इंजीनियर के घर पर एक कमरा किराए पर लिया था। वह घर में बतौर पेइंग गेस्ट रह रही थीं। पिछले साल ही उसने एक मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था।नेहा घर लौटने की बजाय उसी घर में रुककर बच्चों को संभालने में उनकी मां की मदद करने का फैसला लिया, क्योंकि बच्चों के पिता अपनी मर्जी से यूक्रेनी सेना में शामिल हुए और रूस के खिलाफ जंग लड़ने चले गए।

नेहा मकान मालिक की पत्नी और उनके तीन बच्चों के साथ बंकर में रह रही है। नेहा ने कहा, 'मैं रहूं या न रहूं, लेकिन मैं इन बच्चों और उनकी मां को ऐसी स्थिति में नहीं छोड़ूंगी।'

नेहा अपने पिता को पहले ही खो चुकी हैं। उनके पिता भी कुछ साल पहले भारतीय सेना में रहकर देश की सेवा कर चुके हैं। नेहा मां हरियाणा की चरखी दादरी जिले में एक स्कूल टीचर हैं।

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हरियाणा की नेहा ने यूक्रेन छोड़ने से किया इनकार:कहा- युद्ध में शामिल होने गए घर के मालिक के बच्चों की देखभाल करूंगी; कीव में कर रही MBBS की पढ़ाई

फतेहाबाद की युक्ता बोलीं- खाना मिल रहा है लेकिन बंकर में जीना मुश्किल

फतेहाबाद जिले की युक्ता सैनी भी कीव में फंसी हुई है। युक्ता ने बताया कि वो एक बंकर में है। यहां पर करीब 250 से अधिक छात्र हैं जो मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।

युक्ता ने कहा कि यूक्रेन के अधिकारियों ने उन्हें बंकर में ठहराया ताकि कोई नुकसान न हो। खाने की कोई समस्या नहीं है, लेकिन बंकर में रहकर अब जीना मुश्किल हो रहा है। कुछ समय के लिए बंकर से बाहर जाते हैं, लेकिन बाद में फिर उन्हें यहां पर आना पड़ रहा है।

युक्ता सैनी ने वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर गुहार लगाई है कि भारत सरकार जल्द से जल्द उन्हें यहां से निकाले।यहां कर्फ्यू लगा दिया गया है। ऐसे में वे हॉस्टल में भी नहीं जा सकते हैं। कुछ बच्चे बंकर में ही खाना बना रहे हैं तो कुछ का बाहर से आ रहा है।

खार्किव में फंसी छात्राएं बोलीं- हमें मदद नहीं मिली

पंजाब की छात्राएं खार्किव में फंसी हैं। श्रृति गर्ग, श्रीलक्ष्मी, शीना, अक्षया, संतोष का कहना है कि हमें निकालने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। एम्बेसी अभी इंतजार करने के लिए कह रही है, लेकिन यह समय इंतजार करने का नहीं है। छात्राओं ने कहा कि पिछले तीन दिनों से लगातार बमबारी हो रही है और हम मैट्रो स्टेशन पर रुके हुए हैं।

हमारे पास खाने-पीने का सामान तक नहीं है। इंडियन एम्बेसी हमारी कोई हेल्प नहीं कर रही है।

इजराइल और पाकिस्तान ने किया रेस्क्यू

भारतीय छात्राओं ने कहा कि इजराइल ने अपने छात्रों को रेस्क्यू कर लिया। वहीं पाकिस्तान ने भी अपने 70 स्टूडेंट्स को निकाल लिया है। परंतु इंडियन एम्बेसी हमें पोलेंड बॉर्डर पर जाने के लिए कह रही है, परंतु हम ट्रेवल नहीं कर सकती, इन परिस्थितियों में। जब दूसरे देश अपने छात्रों को रेस्क्यू कर सकते हैं तो इंडियन एम्बेसी हमें क्यों नहीं निकाल पा रही। बंकरों में रहना अब आसान नहीं है।

हिमाचल के छात्र की रिपोर्ट

MBBS का आखिरी साल था, फ्लाइट नहीं चढ़ पाया

रूस और यूक्रेन की लड़ाई में मूलरूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले 24 साल के अखिल यूक्रेन में फंसे हैं। बंकर में छिप कर वह अपनी जान बचा रहे हैं। वह इस समय यूक्रेन की राजधानी कीव में है। वह अपने परिवार से विडियो कॉल के जरिए बात भी नहीं कर पा रहे। रूसी सेना लगातार इस इलाके में धमाके कर रही है। ऐसे में उसके परिवार का मोहाली में बुरा हाल है।

अखिल 6 साल पहले यूक्रेन गया था। वहां वह अपनी MBBS की पढ़ाई पूरी कर रहा था। यह उसकी पढ़ाई का अंतिम वर्ष था। 24 फरवरी को वह जैसे ही फ्लाइट पकड़कर भारत आने लगा, उसी वक्त वहां पर रूस ने हमला कर दिया। ऐसे में वह फ्लाइट नहीं चढ़ पाया।

UP के छात्र की रिपोर्ट
हर-हर महादेव के जयघोष के साथ बस में सवार हुए स्टूडेंट

यूक्रेन से बस में सवार होने के बाद खुशियां मनाते स्टूडेंट, जिले का छात्र गंगेश्वर सिंह।
यूक्रेन से बस में सवार होने के बाद खुशियां मनाते स्टूडेंट, जिले का छात्र गंगेश्वर सिंह।

आजमगढ़ जिले के चेवार पश्चिम गांव के अरविंद सिंह के बेटा गंगेश्वर और सगड़ी तहसील के खतीबपुर गांव की रेनू यादव यूक्रेन से रोमानिया जाने के लिए बस में सवार हो गए हैं। बस में सवार होते ही छात्रों ने हर-हर महादेव का जयकारा किया। रेनू ने बताया कि शुक्रवार की रात यूक्रेन सरकार की सलाह पर बंकर में बिताई।

देवरिया की बेटी सृष्टि के पास 2 से 3 दिन का खाना बचा

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में देवरिया की बेटी भी वहां फंसी हुई है।
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में देवरिया की बेटी भी वहां फंसी हुई है।

रुद्रपुर क्षेत्र के मांगा कोडर गांव निवासी सृष्टि यादव पुत्री अमरेन्द्र यादव यूक्रेन में मेडिकल स्टूडेंट हैं। रूस व यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में सृष्टि भी वहां फंस गईं हैं। सृष्टि ने बताया- शहर के करीब ही बम धमाके हो रहा हैं। वे लोग तीन दिनों से फंसे पड़े हैं। यहां हम लोगों के पास दो से तीन दिन का ही खाना है। कैश की भी दिक्कत है। सभी दुकानें बन्द हैं। हम लोगों को जल्द से जल्द यहां से निकाला जाए।

आगरा की श्रेया की रिपोर्ट

मन में आया कि यूक्रेन में ही रूस की मिसाइल से भस्म हो जाऊं

आगरा के शास्त्रीपुरम की रहने वाली श्रेया ने बताया कि वह यूक्रेन के इवानो में फंसी रही। मुझे 60 बच्चों के साथ रोमानिया बॉर्डर भेज दिया गया। यह 400 किमी का सफर शनिवार रात शुरू हुआ और देर रात बॉर्डर से 15 किमी पहले ही हमें बियाबान में छोड़ दिया गया।

ठंड से ठिठुरती रात और भूख प्यास से बदहाल हम एक दूसरे को हिम्मत बंधाते हुए आगे बढ़ने लगे। बॉर्डर पर पहुंचे तो अचानक से धक्का मुक्की शुरू हो गई। मेरा फोन गिर गया और मैं भी। मेरे ऊपर से कई लड़के गुजर गए। दिल किया कि यहां धक्के खाकर मरने से अच्छा है रूस की मिसाइल्स से भस्म हो जाएं तो ये दर्द का सफर खत्म हो। सोचा नहीं था कि जीवन में यह दिन भी देखूंगी।।

आगरा की श्रेया।
आगरा की श्रेया।

सुरक्षित निकालने का हवाला देकर बस में बैठाया, फिर लवीव में छोड़ा

यूपी के आदित्य नारायण पांडेय बताते हैं कि उन्हें यूक्रेन से निकालने के बहाने बॉर्डर से 2 घंटे दूर लवीव शहर में छोड़ दिया गया है। वे यहां सड़क किनारे पड़े हैं। हमला होने पर इमारतों के बेसमेंट में छिपकर जैसे-तैसे अपनी जान बचा रहे हैं।

यूपी के छात्र सत्यजीत कुमार का कहना है कि भारत सरकार उन्हें निकालने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर रही है। यूपी के ही दिवाकर शर्मा ने दैनिक भास्कर को फोन पर बताया है कि जिन सीमाओं पर भारतीयों को रोका जा रहा हैं, वहीं से अब तक 1.50 लाख से ज्यादा यूक्रेनी पोलैंड, मोल्दोवा और रोमानिया पहुंच चुके हैं। हमारा दूतावास हमें निकालने के लिए सिर्फ हवा-हवाई बातें ही कर रहा है।

यूक्रेन में फंसे हुए छात्र अपने वीडियो बनाकर ट्विटर पर जारी कर रहे हैं।
यूक्रेन में फंसे हुए छात्र अपने वीडियो बनाकर ट्विटर पर जारी कर रहे हैं।

अनिरुद्ध बोले- अभी जिंदा हूं, सड़कों पर घूम रहे रूसी सैनिक किसी को नहीं छोड़ रहे

सहारनपुर के ही अनिरुद्ध खारक्यू में हैं। जब भास्कर की टीम ने उनसे फोन पर हालचाल जाना, तो अनिरुद्ध ने तपाक से कहा, अभी जिंदा है। खारक्यू में रूसी सैनिक सड़कों पर घूम रहे हैं। वह किसी को भी नहीं छोड़ रहे हैं। खाना भी नहीं मिल पा रहा है। बंकरों में जमीन कच्ची है। बदबू की वजह से दम निकला जा रहा है। कब क्या हो जाए पता नहीं?

खारक्यू में फंसे अनिरुद्ध।
खारक्यू में फंसे अनिरुद्ध।

इमरान बोले- रोमानिया बॉर्डर पर छात्रों की भीड़, किसी को नहीं मिल रही एम्बेसी से हेल्प

सहारनपुर के इमरान खान ने बताया कि करीब 12 घंटे का सफर तय कर वह रोमानिया बॉर्डर पहुंचे। यहां पिछले 24 घंटे से पांच हजार स्टूडेंट्स खड़े हैं। ​​​​​​सैनिक एंट्री नहीं दे रहे हैं। जबकि इंडियन एम्बेसी ने कहा था कि जब वहां पहुंच जाओगे, तो सभी व्यवस्थाएं मिलेंगी। एम्बेसी के अधिकारी भी फोन नहीं उठा रहे हैं। छात्रों के पास जो खाना था, वह खत्म हो चुका है। मोबाइल ठप पड़ गए है। एक-दूसरे के पास जो खाना है, उसे ही शेयर करके खा रहे हैं।

रोमानिया बॉर्डर पर छात्रों की भीड़।
रोमानिया बॉर्डर पर छात्रों की भीड़।

रोमानिया बॉर्डर पर छूटा बरेली के भाई-बहन का साथ, हैरान करने वाली है आपबीती

गोलियों की आवाजें तस्बीहा के दिल को दहला रहीं थीं। सड़कों पर पड़ी लाशें खौफ से भर देती थीं। बम के धमाके से बंकर तक हिल जाता था। रात में माइनस 16 डिग्री सेल्सियस का तापमान हाड़ कंपा देता था। भूख की वजह से हाल बेहाल था। मगर, बड़ा भाई सिमाल खान हौसले की चट्टान की तरह हर मुसीबत से बहन को निकालते हुए रोमानिया बॉर्डर तक सुरक्षित ले गया।

तस्बीहा की जुबानी पढ़िए कैसे बड़े भाई ने उसकी हर तरह से हिफाजत की...

बीते चार दिनों में हम जान बचाने के लिए 24 घंटे बंकर में छुपे रहे। भूख लगने पर खाने का इंतजाम नहीं था, लेकिन भाई सिमाल ने किसी तरह खजूर का इंतजाम किया। पिता अख्तर हुसैन ने हमें MBBS की पढ़ाई के लिए एक दिसंबर को यूक्रेन भेजा था। चार दिन पहले जैसे ही रूस ने युद्ध की घोषणा की, तब हम फंस चुके थे। युद्ध के बाद नेटवर्किंग सिस्टम ध्वस्त हो गया। घर पर बात नहीं हो पा रही थी।

किसी तरह भाई ने शनिवार को फोन कर बताया कि यहां हालात बहुत खराब हैं। जान बचाने के लिए हमने स्कूल छोड़ दिया था। किसी तरह बचते-बचाते एक बंकर में जगह मिली। हाल यह था कि धमाके की आवाज से बंकर हिलते, तो रुह कांप उठती थी। मैं रोने लगती, तो अपना डर सीने में दफन कर भाई सिमाल चुप करा देता। खाने के लिए खजूर था और पीने के लिए पानी।

जिंदगी और मौत से जूझता भाई अपनी बहन को सुरक्षित लेकर रविवार सुबह रोमानिया बॉर्डर पर पहुंच गया। वहां 15 घंटे इंतजार के बाद वे बॉर्डर पार करके रोमानिया में आ गए, लेकिन वहीं पर भाई-बहन का साथ छूट गया। पता चला कि अभी सिर्फ लड़कियों को ही एयरपोर्ट भेजा जाएगा।

इस पर भाई ने हंसते हुए बहन को एयरपोर्ट के लिए विदा किया, तो बहन की आंखें डबडबा गईं। भाई ने बहन के आंसू पोछे और कहा- अलविदा, परेशान मत हो जल्द ही घर पर मिलेंगे। इसके बाद बहन एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गई।

दिन में -5 तो रात में -16 डिग्री टेंपरेचर

सिमाल ने बताया कि एक तरफ गोलाबारी ने सांसे थाम रखी थीं, तो दूसरी तरफ ठंड भी जानलेवा थी। दिन में तापमान -5 तो रात में -16 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता था। ठंड भी जानलेवा से कम नहीं थी। दिन में ठंड से बचने के लिए कपड़े काफी थे, लेकिन रात में ठंड से बहन की हालत खराब हो जाती थी।

भाई सिमाल बहन को अपनी जैकेट पहना देता था और ठंड बर्दाश्त करते हुए उफ तक नहीं करता था। शनिवार को वह किसी तरह बचते-बचाते निकले तो एक बस की मदद से दोनों रोमानिया बार्डर पर पहुंच गए।

14 घंटे बार्डर पर किया इंतजार फिर मिली इंट्री

सिमाल ने बताया कि वह किसी तरह बस से रोमानिया बॉर्डर तो बहन को लेकर पहुंच गया, लेकिन वहां पहले से ही हजारों लोग मौजूद थे। वहां लोग 24 घंटे से एंट्री का इंतजार कर रहे थे। भीषण जमा देने वाली ठंड में बहन को ढाढस बंधाते हुए किसी तरह उन्होंने 14 घंटे काटे। इसके बाद रविवार सुबह उनको रोमानिया बॉर्डर पर एंट्री मिली, तो दोनों ने राहत की सांस ली।

तस्बीहा अपने भाई सिमाल के साथ।
तस्बीहा अपने भाई सिमाल के साथ।

छत्तीसगढ़ के छात्रों की रिपोर्ट

बिलासपुर के जरहाभाठा की रहने वाली सीमा लदेर की बेटी रिया अदिति लदेर खारकीव के नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में 6th ईयर में पढ़ती है। पिछले चार दिन से उन्हें बंकर और मेट्रो में रात गुजारना पड़ रहा है। खाना बनाना तो दूर बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है। सुबह होने पर कुछ समय के लिए फ्रेश होने जाती है। इस बीच सायरन की आवाज आने पर उन्हें बंकर और मेट्रो में जाकर छिपना पड़ रहा है।

अदिति और उसके साथ रहने वाले स्टूडेंट्स खार्किव में फंसे हैं, जो रूस बार्डर पर है। इसके चलते उन्हें ज्यादा दिक्कत है। शनिवार की शाम को उनके हॉस्टल के पास ही धमाका सुनाई दिया। जैसे ही सायरन बजा, उन्हें बंकरों की ओर भागना पड़ा। चिप्स और ब्रेड से पेट भर रही हैं। पीने के पानी के लिए भी तकलीफ होने लगी है। एक बोतल पानी को घूट-घूट पीकर काम चलाना पड़ रहा है।

झारखंड के छात्रों की रिपोर्ट
आसमान से गिर रहे बम, खाने-पीने का सामान भी हो रहा खत्म

झारखंड के बच्चों ने भास्कर को अपना दर्द बताया।
झारखंड के बच्चों ने भास्कर को अपना दर्द बताया।

बोकारो जिले के चंद्रपुरा प्रखंड अंतर्गत तेलो पूर्वी पंचायत के डॉ. शंकर महतो के बेटे पंकज कुमार महतो यूक्रेन के विनीतासा शहर में फंसे हुए हैं। पंकज विनीतासा नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा है। उसने ने बताया कि वहां हालात बेहद खराब हो चुके हैं। सभी तरह की सुविधाए बंद हो गई हैं। हम लोगों के पास खाने पीने का सामान भी बहुत कम बचा है। ॉ

पलामू के छात्र राहुल सोनी ने बताया- वे खार्किव के छात्रावास के बेसमेंट में रहने को मजबूर हैं। अनहोनी की आशंका के बीच एक-एक पल गुजार रहे हैं। जमशेदपुर के टेल्को की रहने वाली अदिति शर्मा ने बताया है कि खाने-पीने का सामान खत्म हो रहा है।

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