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कोरोना की रोकथाम को लेकर ट्रम्प पर सवाल:चुनाव से पहले प्लाज्मा थैरेपी को मंजूरी देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने दबाव बनाया, अब वैक्सीन को लेकर अधिकारियों ने जताई चिंता

वॉशिंगटन12 दिन पहलेलेखक: शैरॉन लाफ्रेनियर, नोआ वीलैंड और मिशेल डी. शियर
दावा है कि ट्रम्प का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के प्रमुख डॉ. फ्रांसिस कॉलिन्स को किया गया फोन कॉल व्हाइट हाउस का एक प्रेशर कैंपेन था। यह देश की सरकारी हेल्थ एजेंसियों पर अपनी मर्जी थोपने के लिए किया गया था।
  • राष्ट्रपति ने कहा था- फूड एंड एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट से प्लाज्मा थैरेपी को मंजूरी मिली
  • उन्होंने कहा था कि अब बड़े पैमाने पर प्लाज्मा थैरेपी का इस्तेमाल किया जा सकेगा

यह अगस्त का तीसरा हफ्ता था। रिपब्लिकन कन्वेंशन में बस कुछ दिन बाकी रह गए थे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसे लेकर उतावले थे। वहीं, व्हाइट हाउस के अफसर इस बात को लेकर चिंतित थे कि कैसे दिखाया जाए कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए देश ने अगला कदम उठा लिया है।

इसके लिए ब्लड प्लाज्मा यानी कि ठीक हुए मरीजों का खून बीमार मरीजों के लिए इस्तेमाल करने को मंजूरी देनी थी। करीब दो हफ्ते से इमरजेंसी में इसके इस्तेमाल की मंजूरी अटकी थी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) को इसके असरकारी होने को लेकर चिंताएं थीं।

इसलिए 19 अगस्त को ट्रम्प ने एनआईएच के डायरेक्टर डॉ. फ्रांसिस कॉलिन्स को कॉल किया। उन्होंने एक छोटा सा मैसेज दिया कि इस काम को शुक्रवार तक पूरा करवाएं। यह शुक्रवार तक नहीं हो सका। रविवार तक फूड एंड एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट के रेगुलेटर एनआईएच की शंकाओं को दूर करने के लिए अंतिम समय में किया जाने वाला डेटा रिव्यू पूरा नहीं कर सके थे।

क्या था व्हाइट हाउस का प्रेशर कैंपेन?
लेकिन, कन्वेंशन के मौके पर राष्ट्रपति ने एफडीए से प्लाज्मा थैरेपी को मंजूरी मिलने का ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि यह अब बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे मौतें 35% तक कम हो जाएंगी। ट्रम्प का कॉलिन्स को किया गया फोन कॉल व्हाइट हाउस का एक प्रेशर कैंपेन था। यह देश की सरकारी हेल्थ एजेंसियों पर अपनी मर्जी थोपने के लिए किया गया था।

वैज्ञानिकों को हुआ वैक्सीन के लिए दबाव बनाने का डर
प्लाज्मा थैरेपी को मंजूरी दिलाकर व्हाइट हाउस दिखाना चाहता था कि जिस महामारी ने देश में 1 लाख 92 हजार लोगों की जान ली है, उससे लड़ाई में प्रगति हुई है। यह एक ऐसा पल था, जिसके बाद अमेरिका के वैज्ञानिक और सरकारी स्वास्थ्य विभाग से जुड़े रेगुलेटरों को लगने लगा कि ट्रम्प चुनाव से पहले वैक्सीन लाने के लिए भी ऐसा ही दबाव बना सकते हैं। वे वैक्सीन के असरकारी होने और उसके सुरक्षित होने की कसौटियों पर परखे बिना मंजूरी देने को कह सकते हैं।

क्या हुआ प्लाज्मा थैरेपी को मंजूरी दिलाने वाली रात?
प्लाज्मा थैरेपी की मंजूरी की घोषणा वाली रात कॉलिन्स को व्हाइट हाउस आने को कहा गया। उन्हें एक कोरोनावायरस टेस्ट दिया गया और रूजवेल्ट रूम में आने को कह दिया गया। इस रूम में ट्रम्प और दूसरे व्हाइट हाउस ऑफिशियल्स पहले से बैठे थे।

उन लोगों ने ब्रीफिंग रूम में पत्रकारों से बात की। इन सबके बीच डॉ. कॉलिन्स और डॉ. पीटर मार्क्स लाचार होकर सबकुछ देखते रहे। डॉ. पीटर एफडीए के उन टॉप रेग्युलेटर में से एक हैं, जिन पर वैक्सीन को मंजूरी देने के प्रोसेस और इसमें किसी तरह की दखलअंदाजी नहीं होने देने की जिम्मेदारी है।

व्हाइट हाउस ने प्लाज्मा से इलाज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया
व्हाइट हाउस के अफसरों ने प्लाज्मा से असरकारी इलाज होने की बात को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया। इसके बाद से ही इस थैरेपी को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं, जो अगले कई दिनों तक जारी रहीं। ऐलान के बाद कॉलिन्स व्हाइट हाउस से निकल गए।

लेकिन, प्लाज्मा को मंजूरी देने वाले मार्क को ओवल ऑफिस तक ले जाया गया। उन्हें ट्रम्प और उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों से मिलवाने के लिए वहां ले जाया गया था। ट्रम्प वहां दूसरे लोगों के साथ कप केक और व्हाइट आइसिंग के साथ जश्न मना रहे थे।

एनआईएच के डायरेक्टर को जश्न मनाते ट्रम्प से मिलाया गया
मार्क ने मंजूरी मिलने के एक दिन बाद एक इंटरव्यू में कहा कि वे राष्ट्रपति की ओर से उन्हें प्लाज्मा को मंजूरी देने के लिए धन्यवाद देने से थोड़े हैरान थे। हालांकि, उन्होंने कहा था कि ट्रम्प से उनकी मुलाकात काफी कम समय के लिए हुई। इतने कम समय की मुलाकात का कोई मतलब नहीं था।

कई स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह बातें सुनीं, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का डर लगने लगा कि राजनीति और विज्ञान को जोड़ने वाली कड़ी कमजोर हो गई है। यह सब कुछ एक ऐसे समय में हुआ है, जब जनता पहले से इस बात को लेकर चिंतित है कि वैक्सीन और इलाज के आकलन में राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है।

वैक्सीन को लेकर दो धड़ों में टकराव देखा जा रहा
चुनाव में बस सात हफ्ते का समय बचा रह गया है। ऐसे में अमेरिका में वैक्सीन और इलाज को लेकर दो धड़ों मे टकराव देखा जा रहा है। इनमें से एक धड़ा ऐसे वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का है जो रिसर्च, डेटा और बीमारी के रिव्यू के आधार पर काम करते हैं।

वहीं, दूसरी ओर से एक ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनके मन में विज्ञान को लेकर सम्मान नहीं है। वे कोरोनावायरस को रोकने की अपनी राजनीतिक विफलता से चोटिल हैं। वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे अमेरिका के लोगों को कोरोना वैक्सीन और दवा जल्द से जल्द देने के लिए दृढ़ हैं।

वैक्सीन को मंजूरी दिलवाना कठिन हो सकता है
सरकारी वैज्ञानिक और फार्मास्यूटिकल कंपनियों ने राजनीतिक लाभ के लिए लोगों की सुरक्षा से समझौता होने को रोकने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। वे सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए विज्ञान से जुड़े फैसले लेने में ईमानदार रहेंगे।

एफडीए कमिश्नर डॉ. स्टीफन हैन ने कहा है कि बाहरी एक्सपर्ट की एडवाइजरी कमेटी के जरिए वैक्सीन को मंजूरी दी जाएगी। इससे यह प्रक्रिया पहले से ज्यादा कड़ी हो जाएगी। वैक्सीन का इमरजेंसी में इस्तेमाल करने के स्टैंडर्ड्स के लिए नई गाइडलाइंस भी लाई जा सकती है।

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