Hindi News »Jammu Kashmir »Jammu» धारा 370 का सच

धारा -370, यानी कश्मीर में हमेशा बने रहे सबसे ज्यादा मुसलमान

राज्य के सत्ता प्रमुख से चर्चा बाद (महाराजा की 5 मार्च 1948 की उद्घोषणा के अधीन) उसकी सहमति पर ही संभव है।

bhaskar news | Last Modified - Nov 20, 2014, 11:50 AM IST

  • जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में इस बार किसके सिर पर होगा ताज और किसको मिलेगा राजनीतिक वनवास। क्या यहां भी चलेगा मोदी का जादू या फिर पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस या कांग्रेस की बनेगी सरकार। आखिर कश्मीर की राजनीति में क्या है खास। dainikbhaskar.com के माध्यम से हम आपको बता रहे हैं जम्मू-कश्मीर से जुड़ी हर वो बात जो जानना चाहते हैं आप।इसी कड़ी में हम आपको सिलसिलेवार बता चुके हैं कश्मीर के भारत में विलय की पूरी कहानी। कैसे कश्मीर को मिली धारा 370। आज हम आपको बता रहे हैं आखिर क्या है धारा 370 और यह धारा कैसे एक देश को दो भागों में बांटती है।
    श्रीनगर।धारा 370 पर हमेशा देश की राजनीति में उबाल आता रहा है। आमचुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के सिर्फ इतना कह देने पर की आखिर इस धारा से आम कश्मीरियों को फायदा कितना हुआ पर राजनीतिक दलों ने काफी हौ-हल्ला किया था। जानिए आखिर क्या है धारा-370 का सच।
    - भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है।
    - 1947 में विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले स्वतंत्र रहना चाहते थे लेकिन उन्होंने बाद में भारत में विलय के लिए सहमति दी।
    - जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख़ अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी।
    - इसके बाद भारतीय संविधान में धारा 370 का प्रावधान किया गया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
    - 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति दी गई।
    - नवंबर, 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया।
    विशेष अधिकार
    - धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित क़ानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए।
    - इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
    - 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। सूचना का अधिकार कानून भी यहां लागू नहीं होता।
    - इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कही भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते हैं।
    - भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है।वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
    - राज्य की महिला अगर राज्य के बाहर शादी करती है तो वह यहां की नागरिकता गंवा देती है।
    आगे की स्लाइड्स में और जाने इस धारा के बारे में...
  • कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमान
    पहले यह सहमति कश्मीर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने वाले महाराजा, फिर (बाद में) सदरे रियासत से ली जाती थी।अब, संशोधन कर सदरे रियासत की जगह राज्यपाल कर दिया गया है। इस अनुच्छेद का वह प्रावधान हमेशा से विवादास्पद रहा जिसमें कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के हमेशा बहुसंख्यक बने रहने का इंतजाम है। यानी प्रावधान यह है कि भारत के किसी भी क्षेत्र का नागरिक कश्मीर में जाकर न तो स्थायी तौर पर रह सकता , न कोई अचल संपत्ति खरीद सकता है और न ही स्थायी तौर व्यापार कर सकता है। (कश्मीर से जुड़े हिमाचल के हिस्से पर भी यह कानून लागू है) जबकि देश के बाकी राज्यों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं हैं। समय-समय पर सुझाव आता रहा कि कश्मीर के मस्लिमों को देश के बाकी राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर वहां हिंदुओ या अन्य को बसा दिया जाए अथवा कश्मीरी लोगों के वहीं रहते हुए भी राज्य को हिंदू बहुल बना दिया जाए तो पाकिस्तान की तरफ से खड़ी होने वाली समस्याओं का हमेशा के लिए निदान हो जाएगा।
  • दूसरे राज्यों में भी हैं इस धारा के प्रावधान
    वैसे कुछ अन्य राज्य भी है जो अपने जनजातीय रूप और प्रथाओं को बनाए रखने के लिए संसद की शक्ति को सीमित करते हैं। अनुच्छेद 371(क) में प्रावधान है कि जब तक निम्नलिखित मुद्दों पर नगालैण्ड विधानसभा अपनी ओर से कोई संकल्प पारित नहीं करती तब तक इस संबंध में (नीचे दिए गए) संसद का कोई भी अधिनियम नगालैण्ड राज्य पर लागू नहीं होगा। ये मुद्दे हैं-
    क- नगाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएं
    ख-नगा रूढ़िजन्य विधि और प्रक्रिया
    ग- सिविल और दांडिक न्याय प्रशासन, जहां विनिश्चय नगा रूढ़िजन्य विधि के अनुसार होने हैं।
    घ- भूमि और उसके सम्पत्ति स्रोतों का स्वामित्व और अंतरण।
  • राज्यपाल के पास हैं विशेष अधिकार
    इस संबंध में अनुच्छेद 371(ख) के तहत राज्य के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व दिए गए हैं जो विधि और व्यवस्था के संबंध में हैं। राज्य के त्युनसांग जिले का प्रशासन राज्यपाल द्वारा ही चलाए जाने का प्रावधान है। त्युनसांग जिले का ही प्रतिनिधित्व करने वाले एक विधायक को त्युनसांग कार्यमंत्री बनाने का प्रावधान है। अनुच्छेद 371 से 371 (झ) में विशेष उपबंध हैं उनका संबंध नगालैण्ड के उक्त प्रावधानों के साथ ही असम, मणिपुर, आंध्रप्रदेश, सिक्किम, मिजोरम,अरुणाचल प्रदेश और गोवा राज्यों से हैं। प्रत्येक दशा में विचार यह है कि प्रादेशिक, जनजातीय या अन्य भावनाओं की तुष्टि की जाए और स्थानीय लोगों के हितो की रक्षा की जाए।
  • अब तक खत्म नहीं हो पाई धारा
    भारतीय जनता पार्टी हमेशा से इस सुझाव की पक्षधर रही है, लेकिन इस अनुच्छेद को अब तक कोई छेड़ नहीं पाया और न ही स्थिति में कोई बदलाव आया (शायद यह इस अनुच्छेद के राज्य में सम्मिलन से सम्बद्ध होने की वजह से हुआ) डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के पक्षपाती प्रवधानों को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा। उन्होंने नारा दिया था- एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे। उनके निधन के बाद भाजपा ने भी अनुच्छेद – 370 को हटाने के लिए समय-समय पर आंदोलन किए पर अब तक स्थिति जस की तस है।
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