आज का जीवन मंत्र:साधु प्रवृत्ति के लोग किसी की शारीरिक सुंदरता से मोहित नहीं होते, वे इंसानों में भेद नहीं करते हैं

2 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - एक बौद्ध भिक्षु थे उपगुप्त। उनके पिता इत्र का व्यापार करते थे। उपगुप्त अपनी युवा अवस्था में बहुत सुंदर थे, लेकिन भरी जवानी में उनके मन में वैराग्य जाग गया था।

एक दिन उपगुप्त मथुरा की गलियों से भिक्षा मांगने के लिए गुजर रहे थे, उस समय वहां की मशहूर नर्तकी वासव दत्ता ने उपगुप्त को देखा तो वह उनकी सुंदरता देखकर मोहित हो गई।

वासव दत्ता ने पुकारा तो भिक्षा लेने के लिए उपगुप्त वहीं रुक गए। वासव दत्ता ने कहा, 'मैं आपके प्रति आकर्षित हूं, भिक्षा तो क्या मैं अपना सर्वस्व आपको देना चाहती हूं। आप मेरे साथ मेरे घर में आइए।'

उपगुप्त समझ गए कि इसकी दृष्टि अभी देह पर है। उन्होंने कहा, 'मैं आपके पास आऊंगा जरूर, लेकिन फिर कभी।'

वासव दत्ता ने कहा, 'लेकिन वो समय कब आएगा?'

उपगुप्त बोले, 'समय ही इसका जवाब देगा।'

ऐसा कहकर उपगुप्त वहां से चले गए। कुछ वर्षों के बाद मथुरा के एक मार्ग पर एक महिला बैठी हुई थी। उस महिला के शरीर से बदबू आ रही थी, वह बहुत बीमार थी, उसके कपड़े फट चुके थे, वह महिला वासव दत्ता थी। दुराचार की वजह से उसे भयंकर रोग हो गया था। अब उसके पास कुछ नहीं बचा था। उस मार्ग से उपगुप्त गुजर रहे थे, वह उसे पहचान गए। उन्होंने महिला के सिर पर हाथ रखा और बोले, 'वासव दत्ता तुम पूछती थी ना मैं कब आऊंगा, आज मैं आ गया हूं।'

बीमार वासव दत्ता ने पूछा, 'आप कौन हैं?'

उपगुप्त ने अपना परिचय दिया, उसके शरीर के घाव पोछे, उसे कपड़े पहनाए तो वासव दत्ता ने रोते हुए कहा, 'उपगुप्त तुम अब आए हो? अब मेरे पास न तो यौवन है, न सौंदर्य है, सब समाप्त हो गया है।'

उपगुप्त ने कहा, 'भिक्षु के आने का यही समय होता है, मैं सही समय पर आया हूं।'

सीख - साधु प्रवृत्ति के लोग किसी भी इंसान की बाहरी सुंदरता से मोहित नहीं होते हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक चीजों की वजह से दुखी और अशांत हो जाता है, तब साधु-संत ऐसे लोगों की मदद करते हैं, उनके दुख, अशांति को दूर करके उनके मन को शांति की ओर ले जाते हैं। यही साधुता है।