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आज का जीवन मंत्र:अगर हम माता-पिता के साथ ही अन्य लोगों की भी सेवा करते हैं तो भगवान प्रसन्न होते हैं

5 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता

कहानी - महाराष्ट्र के पंढरपुर के पुंडरीक से जुड़ा किस्सा है। पंढरपुर के पुंडरीक भगवान विट्ठल के परम भक्त थे। वे हमेशा भगवान का स्मरण करते रहते थे। वे इतने सरल और सहज थे कि सभी की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनके आसपास इतनी सकारात्मक ऊर्जा रहती थी कि जो कोई उनके संपर्क में आता, वह उनसे प्रभावित हो जाता था।

पुंडरीक अपने माता-पिता की बहुत सेवा करते थे। भगवान विट्ठल भी पुंडरीक की सेवा भावना से बहुत प्रसन्न थे और वे उनके घर भी आते थे। विट्ठल जी को विठोबा और पांडुरंग के नाम से भी जाना जाता है। सिर्फ पुंडरीक जानते थे कि उनके घर भगवान विट्ठल रोज आते हैं, कुछ मांगते हैं और वे उन्हें कुछ देते भी थे।

एक दिन पुंडरीक अपने माता-पिता की सेवा में लगे हुए थे और उसी समय भगवान विट्ठल भी उनके द्वार पर आ गए। भगवान ने द्वार पर से आवाज लगाई, 'पुंडरीक मैं आ गया हूं।'

पुंडरीक माता-पिता की सेवा में थे तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। काफी देर हो गई। भगवान ने फिर आवाज लगाई, 'अरे भाई पुंडरीक, मैं कितनी देर से प्रतीक्षा कर रहा हूं।'

पुंडरीक ने कहा, 'खड़े रहो वहीं, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगा।'

थोड़ी देर भगवान वहीं खड़े रहे और फिर उन्होंने आवाज लगाई, 'पुंडरीक अब तो आओ।'

पुंडरीक ने सोचा कि भगवान को खड़े रहने में दिक्कत आ रही है। उन्होंने पत्थर का एक टुकड़ा उठाया और द्वार की ओर फेंककर कहा, 'सुनो, जब तक मैं न आऊं, इसी पर खड़े रहो विट्ठल।'

एक भक्त पुंडरीक ने अपने भगवान को आदेश दिया, क्योंकि वे उस समय माता-पिता की सेवा कर रहे थे। भक्त अगर सरल और सहज है तो परमात्मा भी उनकी बात मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विट्ठल उस पत्थर पर खड़े हो गए और प्रतीक्षा करने लगे। माता-पिता की सेवा करने के बाद पुंडरीक भगवान विट्ठल से मिलने जाते हैं।

पंढरपुर में भगवान विट्ठल की जो मूर्ति है, उसके बारे में कहा जाता है कि भगवान आज भी उसी पत्थर पर खड़े हैं।

सीख - ये कहानी हमें ये सीख दे रही है कि सरलता और सहजता से भगवान भी बंध जाते हैं तो घर-परिवार में सरलता और सहजता रखेंगे तो रिश्ते बेहतर बने रहेंगे।