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आज का जीवन मंत्र:धनवान लोगों में दया का भाव होना चाहिए और वे दूसरों की मजबूरी को भी समझें

एक महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - एक बार महात्मा गांधी से कुछ लोगों ने पूछा कि दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आपको गुरु बनाना चाहते हैं। आपके भी कोई गुरु होंगे?

गांधी जी विनोदी स्वभाव के थे, वे मजाक-मजाक में बहुत अच्छे संदेश दिया करते थे। गांधी जी ने एक किस्सा सुनाया। गांधी जी ने कहा कि मैंने किसी को गुरु तो नहीं बनाया, लेकिन मुझे गुरु बहुत मिले हैं। उन सभी में मुझे याद रहने वाले एक गुरु का नाम है राज चंद्र भाई, ये बंबई के जौहरी थे। उन्होंने एक व्यापारी से सौदा तय किया। राज चंद्र जी के पास बहुत धन-संपत्ति थी। सौदे में लिखा-पढ़ी ये हुई थी कि निश्चित अवधि में व्यापारी इन्हें पूरी राशि लौटा देगा।

कुछ समय बाद ही बाजार में उतार-चढ़ाव हो गया और उस व्यापारी की स्थिति बहुत खराब हो गई। नौबत ऐसी आ गई थी कि अगर वह व्यापारी लिखा-पढ़ी के आधार पर राज चंद्र जी को राशि लौटाए तो उसका सबकुछ बिक जाएगा। एक दिन वह व्यापारी राज चंद्र जी के पास पहुंचा और बोला, 'आपकी राशि मैं अभी तो लौटा नहीं सकता। लिखा-पढ़ी में तय की गई तारीख पर मैं आपको पैसा लौटाता हूं तो सब खत्म हो जाएगा। मैं बहुत चिंतित हूं, लेकिन मैं वचन देता हूं कि आपका पैसा जरूर लौटा दूंगा।

राज चंद्र जी बोले, 'जितने चिंतित तुम हो, उतना ही मैं भी हूं। तुम इस बात के लिए चिंतित हो कि तुम्हारे पास धन नहीं है। मैं इस बात के लिए चिंतित हूं कि अगर मैं तुमसे धन ले लूं तो तुम बर्बाद हो जाओगे। इस चिंता को मिटाएं और फिर नया सौदा करेंगे।'

राज चंद्र जी ने उस व्यापारी को बैठाया और लिखा-पढ़ी के कागज को उसी के सामने फाड़ कर बोले, 'सारी चिंता इस लिखा-पढ़ी के कागज में थी। अब ये मिट गई है। अब तुम्हें देना हो तो दो और मुझे लेना होगा तो लूंगा।'

व्यापारी ने उन्हें प्रणाम किया और वहां से चला गया।

गांधी जी आगे कहते हैं, 'यहां मैंने उनको गुरु जैसा माना, क्योंकि राज चंद्र ने उस व्यापारी को बहुत अच्छी बात बोली थी कि मैं दूध पी सकता हूं, लेकिन किसी का खून नहीं पी सकता। इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया था।'

सीख - समय कभी भी बदल सकता है। इसलिए अगर हम धनवान हैं और हमने किसी को धन उधार दिया है तो दया का भाव भी होना चाहिए। अगर उधार लेने वाला व्यक्ति हमारा धन वापस करने में असमर्थ है तो हमें थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। किसी को इतना भी नहीं दबाना चाहिए कि वह पूरी तरह टूट ही जाए।