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आज का जीवन मंत्र:लक्ष्य तक पहुंचने के बाद अपनी शिक्षा और अपने साधनों पर घमंड न करें

6 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - गौतम बुद्ध शिष्यों को रोज उपदेश देते थे। एक दिन सत्संग के बीच शिष्यों ने पूछा, 'साध्य और साधन में क्या अंतर है और इनका उपयोग कैसे करना चाहिए?'

इस प्रश्न का अर्थ यह है कि जैसे हम पढ़ रहे हैं तो वह साधन है, लेकिन हम शिक्षित होकर योग्य बनना चाहते हैं, वह साध्य है। शिष्यों ने जब ये प्रश्न पूछा तो बुद्ध कुछ देर सोचने के बाद बोले, 'मैं आप लोगों को एक कहानी सुनाता हूं। आठ विद्वान नाव में बैठकर नदी पार कर रहे थे। जब उन्होंने नदी पार कर ली तो सभी ने विचार किया कि जिस नाव ने हमें नदी पार करवाई है, जिसने हमें अपने अंदर बैठाया है, उसे धन्यवाद देना चाहिए।

सभी विद्वान थे तो धन्यवाद देने का उन्होंने एक निराला तरीका निकाला। आठों विद्वानों ने नाव को नदी से निकाला और उसे उठाकर अपने सिर पर रख लिया। सभी कहने लगे कि नाव तुझे धन्यवाद, तूने हमें बैठाया, हमने तुझे बैठाया। सभी विद्वान नाव उठाकर गांव में प्रवेश करने लगे तो लोगों ने उनसे पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं? हमने जीवनभर लोगों को नाव में बैठा हुआ देखा है, आज पहली बार लोगों के ऊपर नाव देखी है, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

विद्वानों ने कहा कि हम नाव को धन्यवाद दे रहे हैं। इसने हमें यहां पहुंचाया है। ये बात सुनकर गांव के लोग विद्वानों के ऊपर हंसने लगे।'

ये कहानी सुनाते हुए बुद्ध भी हंसने लगे और बोले, 'साधन को एक समय के बाद छोड़ देना चाहिए। लोग साधन को ही ओढ़ लेते हैं तो साध्य यानी लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाते हैं। नाव एक साधन है। जैसे शिक्षा एक साधन है, लोग इसे अपनाते हैं और फिर शिक्षित होने के बाद अपनी शिक्षा का ही अहंकार करने लगते हैं। जबकि जिस काम के लिए हम शिक्षित हुए हैं, वह काम हमें करना चाहिए, लेकिन व्यक्ति अपने साधन का प्रदर्शन करता है, जैसे ये विद्वान कर रहे थे।'

सीख - किसी लक्ष्य तक, किसी साध्य तक पहुंचने के लिए हमें साधन तो चाहिए, लेकिन जब हमारा उद्देश्य पूरा हो जाए तो हमें अपने साधन पर घमंड नहीं करना चाहिए।