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आज का जीवन मंत्र:दान तप से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, दूसरों के मुश्किल समय में काम आना भी दान ही है

5 दिन पहले
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कहानी - महाभारत में युधिष्ठिर ऋषि वेद व्यास से बड़े अलग ढंग के प्रश्न पूछा करते थे। एक दिन उन्होंने पूछा, 'मैं आपसे जानना चाहता हूं कि दान बड़ा है या तपस्या?'

व्यासजी ने कहा, 'अगर मैं ऐसे ही बताऊंगा तो समझ नहीं आएगा। मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। एक मुद्गल नाम के महर्षि थे, वे भिक्षा मांगकर अपना जीवन चला रहे थे। भिक्षा में उन्हें आटा, खाने-पीने की चीजें, हवन सामग्री आदि मिल जाती थी। इन्हीं चीजों में से वे अपने लिए भोजन बनाते और हवन आदि पूजा-पाठ करते थे।

महीने में दो दिन वे भूखे ही रह जाते थे, ये दो दिन थे अमावस्या और पूर्णिमा के। इन दो तिथियों पर ऋषि मुद्गल के यहां दुर्वासा ऋषि आया करते थे। दुर्वासा मुनि को खाना देने के बाद मुद्गलजी के पास खाने के लिए कुछ बचता नहीं था।

दुर्वासाजी ये बात जानते थे। एक दिन उन्होंने मुद्गलजी से पूछा, 'आप मुझे खाना देकर खुद भूखे रहते हैं, लेकिन मैंने कभी भी आपके चेहरे पर चिंता, परेशानी या भूख के लक्षण नहीं देखे हैं।'

मुद्गलजी ने कहा, 'मेरे लिए दान सबसे ऊपर है और अन्न दान तो सर्वश्रेष्ठ है। आपको खाना खिलाकर मैं वैसे ही तृप्त हो जाता हूं।'

देवदूतों ने ये बात सुनी तो उन्होंने मुद्गल ऋषि से कहा, 'आपकी जगह स्वर्ग में है, क्योंकि स्वर्ग में वही जाते हैं जो पुण्य करते हैं। पुण्य तप और दान से मिलता है। जिस व्यक्ति के पुण्य अधिक होते हैं, वह स्वर्ग में जाता है और जिसके पुण्य खत्म हो जाते हैं, वह नर्क में जाता है। अन्न दान से आपके पुण्य बढ़ गए हैं।'

मुद्गल ऋषि ने कहा, 'दान से पुण्य मिलता है, इस बात का समीकरण मैं नहीं बैठाता। मुझे सिर्फ दान करना है।'

तपस्या कभी-कभी स्वयं के लिए की जाती है, लेकिन दान हमेशा दूसरों की भलाई के लिए ही किया जाता है। दान से पुण्य बढ़ेगा, ये बात नहीं सोचना चाहिए।'

व्यासजी ने युधिष्ठिर से आगे कहा, 'दूसरों की आवश्यकता की पूर्ति करना ही दान है। इसलिए दान तप से भी श्रेष्ठ है।'

सीख - दूसरों के मुश्किल समय में काम आना दान है। जो लोग तन, मन, धन और जन का दान करते हैं, उन्हें प्रकृति बदले में कुछ न कुछ अच्छा उपहार जरूर देती है।

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