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आज का जीवन मंत्र:माता-पिता के वचन को पूरा करना संतान का कर्तव्य है, इससे घर-परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ती है

3 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर दर्शनशास्त्री और धर्म के बड़े जानकार थे। वे अपनी दान वृत्ति की वजह से भी बहुत प्रसिद्ध थे। उनके दरवाजे से कभी भी कोई खाली हाथ नहीं जाता था, लेकिन उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी आया, जब वे आर्थिक रूप से कमजोर हो गए थे।

एक दिन देवेंद्रनाथ टैगोर के पास अनाथ आश्रम का संचालन करने वाली एक संस्था के कुछ पदाधिकारी पहुंचे। अधिकारियों ने कहा, ‘आपके पिता द्वारकानाथजी ने अनाथालय के लिए एक लाख रुपए दान देने की घोषणा की थी। फिर उनके निधन के बाद ये बात अधूरी रह गई। अभी हमें पैसों की बहुत जरूरत है, इसीलिए हम आपके पास आए हैं।’

उस समय देवेंद्रनाथजी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। तब एक लाख रुपए बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। उनके पास ऐसा कुछ प्रमाण भी नहीं था कि पिताजी ने इन लोगों को दान देने की घोषणा की थी, लेकिन देवेंद्रनाथजी ने अधिकारियों की बात पर विश्वास किया और कहा, ‘अगर मेरे पिता ने कोई वचन दिया है तो उसे मैं पूरा जरूर करूंगा।’

देवेंद्रनाथ टैगोर ने अपनी कुछ जमीन बेची और अनाथ आश्रम के लिए एक लाख रुपए की व्यवस्था कर दी। इसके बाद एक दिन उन्होंने अपने बेटे रवींद्रनाथ टैगोर से कहा, ‘अगर माता-पिता ने जनहित में कोई काम करने का संकल्प लिया है, कोई वचन दिया है तो संतान का ये कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता के वचन को पूरा करे, क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा में ही हमारे घर-परिवार की प्रतिष्ठा है।’

रवींद्रनाथ टैगोर कहा करते थे, ‘मेरे पिता की ये बात मैं कभी नहीं भूलता और मैं दूसरों को भी ये बात हमेशा समझाता हूं।’

सीख - माता-पिता और घर के अन्य बड़े-बूढ़ों ने जो भी अच्छे काम शुरू किए हैं या जो अच्छे काम अधूरे छोड़े हैं, उन्हें पूरा करने का दायित्व संतान का होता है। पितरों के अच्छे कामों को आगे बढ़ाना भी संतान के लिए पूजा करने की तरह ही है।