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आज का जीवन मंत्र:सुख-दुख का आना-जाना लगा रहता है, सुख के दिनों में दुख से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए

2 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - द्वापर युग में कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो देवकी ने बच्चे को गले से लगा लिया। उसी समय वसुदेव ने देवकी से कहा, 'इस बच्चे को मुझे दे दो। मुझे इसे गोकुल छोड़कर आना है।'

देवकी ने कहा, 'मैंने एक-एक करके सभी बच्चे कंस को सौंप दिए और कंस ने उन्हें मार दिया है। मैं इसे नहीं दूंगी।'

उस समय जो व्यवस्था भगवान ने बनाई थी, उसके अनुसार वसुदेवजी को भगवान के बाल स्वरूप को गोकुल लेकर जाना था। देवकी के मना करने के बाद भी वसुदेव ने उस बच्चे को उठा लिया और सुपड़े में रखकर गोकुल की ओर चल दिए।

बाल कृष्ण ये दृश्य देख रहे थे। देवकी वसुदेव के पैरों में गिरकर कहती हैं, 'मेरा बेटा मुझे लौटा दो। मैंने कंस को वचन दिया था कि मैं सभी बच्चे उसे सौंप दूंगी, लेकिन वह हमें उसी दिन मार देता तो अच्छा होता। रोज-रोज कैसे मरा जाए?'

देवकी रो रही थीं, लेकिन वसुदेव नहीं रुके और कारागार से निकल गए। बाल कृष्ण ने जब ये दृश्य देखा तो उन्होंने सोचा, 'मैंने भी क्या व्यवस्था बनाई है। मेरे जन्म के पहले दिन मेरी मां को ऐसे रोना पड़ रहा है।'

सीख - यहां श्रीकृष्ण ने ये संदेश दिया कि जीवन में दुख तो आएंगे। बड़े-बड़े समर्थ व्यक्ति के जीवन में भी दुख आते हैं। देवकी और वसुदेव से बड़ा और कौन होगा, जिनके यहां भगवान खुद संतान बनकर आए, लेकिन उन्हें भी दुखों का सामना करना पड़ा। अब प्रश्न ये है कि दुख का निपटारा कैसे किया जाए? दुख को तीन तरीकों से निपटाया जा सकता है। पहला, दुख को सह लें। दूसरा, दुख को समझ लें और तीसरा, दुख को सुलझा लें। दुख के मामले में तो भगवान अपने माता-पिता की भी मदद नहीं कर पाए तो उनके भक्तों को भी दुखों से निपटने की तैयारी खुद ही रखनी चाहिए।