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आज का जीवन मंत्र:कभी भी अपने घर में गुस्सा नहीं करना चाहिए, वरना रिश्ते बिगड़ सकते हैं

4 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार, ये चारों ब्रह्माजी के मानस पुत्र माने गए हैं। ये चारों पांच साल के बच्चे की तरह दिखाई देते थे और हमेशा परमात्मा का ध्यान करते और घूमते रहते थे। इनका हर पल भगवान के चिंतन में व्यतीत होता था। अनेक बड़े-बड़े लोगों को इन्होंने कथाएं सुनाईं, भागवत ग्रंथ का ज्ञान दिया। इनके पास अगर कोई आ जाए तो उसे बड़ी तृप्ति मिलती थी।

एक बार इन चारों के साथ एक गड़बड़ हो गई। इन लोगों ने बैकुंठ की यात्रा की। जब ये लोग बैकुंठ पहुंचे तो वहां के द्वारपाल जय-विजय ने इन्हें बाहर ही रोक दिया। जय-विजय ने सोचा कि ये चार छोटे बच्चे खेलते-खेलते यहां पता नहीं कैसे आ गए? जय-विजय ने चारों बच्चों को डांटते हुए कहा, 'ये भगवान का धाम है। यहां के कुछ नियम हैं, कुछ कायदे हैं। चलो भागो यहां से।'

चारों सनकादि ऋषियों ने जय-विजय से कहा, 'तुम भगवान के द्वारपाल हो। हमें नियम सिखा रहे हो और तुम स्वयं नियम भूल गए हो। मर्यादा, विनम्रता ये तुममें होना चाहिए। तुम इस जगह के लिए योग्य नहीं हो। हम श्राप देते हैं कि तुम ऊपर से नीचे गिर जाओगे और आने वाले जन्मों में राक्षस बनोगे।

जय-विजय तो राक्षस बन गए, लेकिन जब भगवान को ये बात मालूम हुई तो उन्हें लगा कि मेरे द्वार पर संतों का अपमान हुआ है। भगवान विष्णु इनके पास पहुंचे और इन चारों से क्षमा मांगी। इन चारों ऋषियों ने विष्णु जी से कहा, 'उस समय हमें भी गुस्सा आ गया था।'

विष्णु जी बोले, 'उन दोनों का दोष ये है कि उनका अहंकार नहीं गया और आपको स्वर्ग के द्वार पर क्रोध आ जाए तो ये भी सोचने वाली बात है, ये सात्विक अहंकार है।'

सीख - उपलब्धियां इंसान का दिमाग खराब कर देती हैं, ये बात सही है। कभी-कभी अच्छे काम भी सूक्ष्म अहंकार पैदा कर देते हैं। ये अहंकार क्रोध के रूप में निकलता है। जिस तरह स्वर्ग के द्वार पर गुस्सा नहीं करना चाहिए, ठीक उसी तरह अपने घर में भी गुस्सा न करें, वरना रिश्ते बिगड़ सकते हैं। बड़े-बड़े संत महात्माओं को क्रोध आ जाता है, क्योंकि ये सात्विक अहंकार है। हमें अपना अहंकार मिटाने की कोशिश करनी चाहिए।