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आज का जीवन मंत्र:विचारों में पवित्रता चाहते हैं तो अन्न हमेशा ईमानदारी की कमाई का ही खाना चाहिए

एक महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - गुरुनानक जी एक गांव में रुके हुए थे। उनके आसपास काफी भीड़ रहती थी। उस समय गुरुनानक जी को बताया कि गांव के एक जमींदार आए हैं, आपसे मिलना चाहते हैं और आपके लिए भोजन लेकर आए हैं।

गुरुनानक जी ने जमींदार को बुलवाया। जमींदार ने उन्हें प्रणाम किया। गुरुनानक जी ने उससे कहा, 'भोजन यहां रख दीजिए।'

जमींदार ने खाना वहीं रख दिया और गुरुनानक जी लोगों से मिलने-जुलने में व्यस्त हो गए। जमींदार ने आग्रह किया, 'मैं स्वयं आपको खाना रखूंगा। मेरे सामने आप भोजन करिए।'

नानक जी ने उसे कुछ देर रुकने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद वहां एक सामान्य सा लोहार आया। उसने फटे कपड़े पहने थे, वह बहुत ही गरीब था। उसने गुरुनानक को परिचय दिया, 'मैं लोहारी का काम करता हूं। बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी कमा पाता हूं। मुझे मालूम हुआ कि आप आए हैं तो मैं आपसे मिलने चला आया हूं। आपके लिए रोटी लेकर आया हूं।'

जमींदार ने उसकी हालत देखी और मुस्कान के साथ कहा, 'रोटी तो आ चुकी है, तुम ये रोटी वापस ले जाओ।'

नानक जी बोले, 'रुको, खाने का यूं अपमान नहीं करते हैं।'

जमींदार फिर बोला, 'मेरे पास रोटी के साथ ही अन्य पकवान भी हैं, एक विशिष्ट मिठाई भी है।'

नानक जी बोले, 'उसे भी चख लेंगे।' ये बोलकर गुरुनानक ने लोहार की आधी रोटी खा ली और आधी अपने हाथ में रख ली, क्योंकि वे जानते थे कि जमींदार आपत्ति लेगा और जमींदार ने आपत्ति लेते हुए कहा, 'आपने ये क्या किया? मेरा भोजन छोड़कर इसकी रोटी खा ली।'

नानक हर काम बहुत सोच-समझकर किया करते थे। उन्होंने लोहार की रोटी को हाथों से मसला तो उसमें से दूध की बूंद गिरी और जब जमींदार की मिठाई को मसला तो उसमें खून की बूंद गिरी। ये देखकर सभी लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी जानते थे कि नानक ऐसे कमाल कर देते हैं। दिव्य आत्माएं हमारे शरीर से अद्भुत काम करा लेती हैं, लेकिन आत्म सिद्ध करनी होती है, यही काम नानक करते थे।

नानक बोले, 'इसकी सूखी रोटी में ईमानदारी है और तुम्हारी मिठाई में भी कहीं न कहीं बेईमानी है।'

सीख - नानक हमें समझा रहे हैं कि अन्न हमेशा ईमानदारी से ही कमाना चाहिए। बेईमानी का अन्न खाने से मन अशांत रहता है, विचारों में पवित्रता नहीं रहती है।