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तीज-त्योहार:गणेश विसर्जन का पर्व है अनंत चतुर्दशी, श्रीकृष्ण ने पांडवों को दी थी इस व्रत को करने की सलाह

5 महीने पहले
  • अग्नि पुराण के अनुसार अनंत चतुर्दशी का व्रत से मिलती है कष्टों से मुक्ति, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान किया था ये व्रत

अग्नि पुराण के अनुसार हिंदी कैलेंडर के भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी पर्व मनाया जाता है। जो इस बार 1 सितंबर को है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन पार्थिव गणेश के विसर्जन के साथ दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन होता है। माना जाता है कि महाभारत काल में इस व्रत की शुरुआत हुई थी। जब पांडवों का राज्य छिन लिया गया था तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ये व्रत करने की सलाह दी थी। अनंत चतुर्दशी पर गणेशजी की पूजा के बाद घर में ही किसी बड़े बर्तन या गमले में गणेश प्रतिमा का विसर्जन करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए।

महाभारत काल में इसकी शुरुआत
मान्यता है कि महाभारत काल में इस व्रत की शुरुआत हुई थी। जब पांडव जुए में अपना राज्य गंवाकर वन-वन भटक रहे थे, तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी व्रत करने को कहा था। श्रीकृष्ण ने कहा- "हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनन्त भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा। श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनन्त भगवान का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पाण्डव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे।

14 गांठें भगवान श्री हरि के 14 लोकों की प्रतीक
इस व्रत में सूत या रेशम के धागे को कुमकुम से रंगकर उसमें चौदह गांठे लगाई जाती हैं। इसके बाद उसे विधि-विधान से पूजा के बाद कलाई पर बांधा जाता है। कलाई पर बांधे गए इस धागे को ही अनंत कहा जाता है। भगवान विष्णु का रूप माने जाने वाले इस धागे को रक्षासूत्र भी कहा जाता है। ये 14 गांठे भगवान श्री हरि के 14 लोकों की प्रतीक मानी गई हैं। इस अनंत रूपी धागे को पूजा में भगवान विष्णु पर अर्पित कर व्रती अपनी भुजा में बांधते हैं।

धन और संतान की कामना से किया जाता है
धन और संतान की कामना से यह व्रत किया जाता है। मान्यता है कि यह अनंत हम पर आने वाले सब संकटों से रक्षा करता है। यह अनंत धागा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देता है। इस व्रत के बारे में शास्त्रों का कथन है कि यह समस्त प्रकार के कष्टों से मुक्ति दिलाता है, विपत्तियों से उबारता है। महाभारत के अनुसार माना जाता है कि इस व्रत को करने से दरिद्रता का नाश होता है और ग्रहों की बाधाएं भी दूर होती हैं।

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