व्रत-उपवास:26 मई को गुरुवार और अपरा एकादशी के योग, इस तिथि पर की जाती है महालक्ष्मी की विशेष पूजा

एक महीने पहले
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गुरुवार, 26 मई को ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी है, इसे अपरा और अचला एकादशी कहा जाता है। अपरा एकादशी पर विष्णु जी के साथ ही देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन भक्त पूरा दिन निराहार रहकर व्रत करते हैं, भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करते हैं।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार इस तिथि पर जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए भगवान से क्षमा याचना की जाती है। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की कृपा से जीवन सुख-शांति बनी रहती है।

अपरा एकादशी पर सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए। सुबह जल्दी उठना चाहिए और स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें। घर के मंदिर में या किसी अन्य मंदिर में भगवान के सामने व्रत और पूजा करने का संकल्प करें। इस दिन तामसिक भोजन से बचना चाहिए। नशा न करें। घर-परिवार में सुख-शांति बनाए रखें। क्रोध से बचें। गणेश पूजा करें। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का अभिषेक करें। भगवान को पीले वस्त्र चढ़ाएं। गुरुवार को एकादशी होने से इस दिन गुरु ग्रह की भी विशेष पूजा करें। गुरु ग्रह की पूजा शिवलिंग रूप में की जाती है। इसलिए शिवलिंग पर केसर मिश्रित जल चढ़ाएं। बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर आरती करें।

ये है अचला एकादशी की कथा

पुराने समय में महिध्वज नाम का एक राजा था। राजा के छोटे भाई का नाम ता वज्रध्वज। वज्रध्वज बड़े भाई को शत्रु मानता था। एक दिन उसने बड़े भाई की हत्या कर दी और एक पीपल के नीचे राजा के शव को गाढ़ दिया। अकाल मृत्यु की वजह से राजा की आत्मा प्रेत बनकर उसी पीपल पर रहने लगी। राजा की आत्मा सभी को परेशान कर रही थी।

एक दिन उस पेड़ के पास एक ऋषि पहुंचे। ऋषि तपस्वी थे, उन्होंने राजा की आत्मा को देख लिया और उन्हें मालूम हो गया कि राजा के साथ क्या हुआ था। ऋषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए अपरा एकादशी का व्रत रखा था। द्वादशी तिथि पर व्रत पूरा हुआ और ऋषि ने अपना पुण्य उस राजा की आत्मा को दिया। एकादशी व्रत का पुण्य से राजा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। इस कथा के मुताबिक अपरा एकादशी का व्रत सभी तरह के दुख दूर कर सकता है।