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जन्माष्टमी का व्रत:जन्माष्टमी पर पूजा-पाठ के साथ ही उपवास भी क्यों किया जाता है? योग, आयुर्वेद और ग्रंथ सभी में बताया है इसका महत्व

एक महीने पहलेलेखक: शशिकांत साल्वी
  • आयुर्वेद के अनुसार उपवास करने से पाचनतंत्र को मिलता है आराम
  • धर्म के नजरिए से जन्माष्टमी के व्रत से भक्तों की मनोकामनाएं होती हैं पूरी

आज श्रीकृष्ण के गृहस्थ भक्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग जन्माष्टमी मना रहे हैं। जन्माष्टमी पर व्रत करने का विशेष महत्व है। अधिकतर भक्त इस तिथि पर अन्न ग्रहण नहीं करते हैं, कुछ लोग दिनभर निराहार रहते हैं तो कुछ सिर्फ फलाहार करते हैं। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित कल्याण अंक में जन्माष्टमी व्रत का महत्व बताया गया है। ये धार्मिक महत्व कहता है कि इस व्रत से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। लेकिन, योग, आयुर्वेद इन दोनों में ही उपवास के कई फायदे बताए गए हैं। जन्माष्टमी पर व्रत सिर्फ भगवान को खुश करने या उसकी कृपा पाने का रास्ता नहीं है। इसके जरिए हम अपने शरीर को बेहतर बना सकते हैं। जन्माष्टमी पर उपवास करने से आपको तीन तरह से फायदा हो सकता है।

योग कहता है, वाणी में प्रभाव बढ़ाता है इस दिन उपवास

योग और ध्यान में उपवास का अलग महत्व है। योग कहता है हमारे शरीर में सात चक्र हैं, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। इनमें से 5वां विशुद्धि चक्र होता है। जो हमारे कंठ में होता है। ये वाणी का चक्र है। इसकी शुद्धि से वाणी में प्रभाव पैदा होता है और इस चक्र के स्वामी भगवान कृष्ण हैं। जन्माष्टमी भगवान कृष्ण का दिन है। इस दिन उपवास कर कृष्ण का ध्यान करने से विशुद्धि चक्र जागृत होता है। इससे हमारी वाणी में प्रभाव पैदा होता है।

धर्म कहता है भक्ति में आलस से बचने के लिए उपवास

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक जन्माष्टमी पर पूरे दिन श्रीकृष्ण की भक्ति, मंत्र जाप और पूजा करने की परंपरा है। अन्न ग्रहण करने से आलस्य बढ़ता है, अन्न पचाने के लिए शारीरिक मेहनत करनी होती है। जन्माष्टमी पर अगर अन्न ग्रहण किया जाता है तो आलस्य और अपच की स्थिति में भक्त का मन भक्ति में नहीं लग पाएगा।

भक्त का मन भक्ति में रमा रहे, इसके लिए जन्माष्टमी पर अन्न का त्याग किया जाता है। फलाहार करने से भूख शांत होती है। फलाहार जल्दी पचने वाला होता है, कम शारीरिक मेहनत में ही पच जाता है। फलों के सेवन से आलस्य की समस्या भी नहीं होती है। विचार में पवित्रता और सकारात्मकता बनी रहती है। भूख शांत रहती है तो हम मंत्र जाप, तप और पूजा एकाग्र होकर कर पाते हैं।

आयुर्वेद में उपवास शरीर की भीतरी सफाई का जरिया

उज्जैन के आयुर्वेदिक कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. राम अरोरा ने बताया कि चरक संहिता के सूत्रस्थानम् अध्याय में उपवास का महत्व बताया गया है। ये शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। आयुर्वेद में रोगों का उपचार 6 तरह से किया जाता है। ये 6 प्रकार हैं लंघन, बृंहण, रूक्षण, स्नेहन, स्वेदन और स्तंभन। इनमें लंघन का महत्व काफी अधिक है। इसमें शरीर को हल्कापन देने वाले द्रव्यों का उपयोग किया जाता है। लंघन के भी 10 प्रकार हैं। वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, निरूढ़ वस्ति, पिपासा, वायु का सेवन, धूप का सेवन, पाचन औषध-द्रव्यों का सेवन, उपवास और व्यायाम।

लंघन के 9वें प्रकार उपवास से पाचन ठीक होता है। कफ और पित्त नियंत्रित होते हैं। वात विकार यानी गैस, अपच, डकार आना, जी मचलाना जैसे समस्या में उपवास बहुत लाभदायक होते हैं। एक दिन अन्न ग्रहण न करने पर हमारे पाचनतंत्र को आराम मिलता है। ऐसी स्थिति में पाचनतंत्र और पेट की भी सफाई हो जाती है। फलों के सेवन से शरीर को जरूरी ऊर्जा मिलती है।

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