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सकट चतुर्थी आज:626 साल पहले जयपुर के महाराजा ने बनवाया था सकट गांव का चौथ माता मंदिर

3 महीने पहले
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  • महाराजा मानसिंह ने चौथ माता का मंदिर बनवाने के बाद बसाया था सकट गांव

राजस्थान के अलवर से करीब 60 किमी दूर सकट नाम का गांव है। वहां संकट चौथ माता का मंदिर है। राजस्थान सरकार के मुताबिक ये मंदिर तकरीबन 626 साल पुराना है। इस मंदिर परिसर में गणेशजी और भगवान भैरव की मूर्तियां भी हैं। इसलिए चौथ के दिन यहां गणेश जी की विशेष पूजा होती है। इनमें भी संकष्टी चतुर्थी व्रत को बहुत खास माना जाता है। इस व्रत को वक्रतुंडी चतुर्थी, माघी चौथ और तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है।

हिंदू पचांग के मुताबिक ये व्रत माघ महीने के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। सकट चौथ का व्रत संतान की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। राजस्थान में इसी तिलकुट चतुर्थी के दिन चौथ का बरवाड़ा नाम की जगह पर बड़ा मेला भी लगता है।

चौथ माता का मंदिर बनवाने के बाद बसाया सकट गांव
मंदिर के मंदिर के शिलालेख से पता चलता है कि विक्रम संवत 626 साल पहले जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम ने चौथ माता का मंदिर बनवाने के बाद सकट गांव बसाया था। पहले ये गांव मंदिर से करीब दो किलोमीटर दूर काली पहाड़ी की तलहटी में बसा था। इसके अवशेष आज भी मिलते हैं। सकट का नाम पहले गादरवाड़ा था।

चौथ माता मंदिर गांव के स्थान से पहले हरा भरा जंगल था। पहले यहां गादरवाड़ा के लोग पशु चराते थे। यहां के लोगों का मानना है कि 600 साल पहले टीले पर लगे जाल के पेड़ के नीचे एक गाय आकर खड़ी हो जाती थी और उसके थन से अपने आप दूध की धारा जमीन के भीतर चली जाती थी। इसको एक ग्वाले ने देखा और वो उस गाय के साथ ही रहा। इसके बाद वो रोज देखता कि गाय उसी पेड़ के नीचे खड़ी हो जाती है और अपने आप दूध की धारा निकलने लगती है। इसके बाद वहां मंदिर बनाने की कवायद शुरू हो गई।

करीब 1 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर है ये मंदिर
माना जाता है चौथ माता की प्रतिमा सन 1332 के लगभग चौरू गांव में स्थित थी।
सन 1394 के आसपास बरवाड़ा में महाराजा भीम सिंह ने चौथ माता मंदिर बनवाया था, जो पंचाल के पास के गांव से चौथ माता की मूर्ति लाये थे।
1451 में मंदिर का जीर्णोद्घार किया गया था। जबकि मंदिर के रास्ते में बिजली की छतरी और तालाब 1463 में बनवाया गया।
ये मंदिर करीब एक हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर मौजूद है।

चढ़नी पड़ती हैं 599 सीढ़ियां
शहर से 35 किमी दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह मंदिर जयपुर शहर के आसपास का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।
मंदिर सुंदर हरे वातावरण और घास के मैदान के बीच स्थित है। सफेद संगमरमर के पत्थरों से स्मारक की संरचना तैयार की गई है। दीवारों और छत पर शिलालेख के साथ यह वास्तुकला की परंपरागत राजपूताना शैली के लक्षणों को प्रकट करता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए 599 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। देवी की मूर्ति के अलावा, मंदिर परिसर में भगवान गणेश और भैरव की मूर्तियां भी दिखाई पड़ती हैं।

मंदिर से जुड़ी परंपराएं
यहां के लोग हर शुभ काम से पहले चौथ माता को निमंत्रण देते हैं। गहरी आस्था की वजह से बूंदी राजघराने के समय से ही इसे कुल देवी के रूप में पूजा जाता है। माता के नाम पर कोटा में चौथ माता बाजार भी है। कोई संतान पाने की इच्छा तो कोई अंखड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना लेकर चौथ माता के दर्शन को आता है। माना जाता है कि सभी की इच्छा पूरी होती हैं। चौथ माता मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में गांव वालों का कहना है कि चौथ माता को कुंवारी कन्या का रूप माना जाता है। साथ ही यहां कोई भी इंसान चौथ माता मंदिर के शिखर से ज्यादा ऊंचा मकान नहीं बनवाता है।

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