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छठ पर्व 18 से 21 तक:इस बार छठ पूजा में ग्रह-नक्षत्रों का शुभ संयोग, भगवान सूर्य को 'रवियोग' में दिए जाएंगे दोनों अर्घ्य

16 दिन पहले
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  • छठ महोत्सव में एक द्विपुष्कर, दो सर्वार्थसिद्धि और हर दिन रवियोग बनने से मिलेगा व्रत और पूजा का पूरा फल

छठ पूजा 20 नवंबर को है। नहाय खाय के साथ शुरू होने वाले इस पर्व में भगवान सूर्य की विशेष उपासना की जाती है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्र का कहना है कि इस बार छठ पर्व में ग्रह-नक्षत्रों का विशेष संयोग बन रहा है। इस महोत्सव की शुरुआत "रवियोग में हो रही है और हर दिन ये योग बन रहा है। रवियोग में ही भगवान सूर्य को दोनों अर्घ्य दिए जाएंगे। सूर्य की विशेष स्थिति के कारण ये संयोग बनता है। छठ महोत्सव में एक द्विपुष्कर, दो सर्वार्थसिद्धि और चार रवियोग बन रहे हैं। आखिरी दिन 3 शुभ योगों का होना भी इस पर्व को और भी खास बना रहा है।

रवियोग: सूर्य का विशेष प्रभाव होने से इस योग को शुभ और बेहद प्रभावशाली भी माना जाता है। सूर्य की पवित्र ऊर्जा से भरपूर होने से इस योग में किए गए काम में सफलता की संभावना बहुत बढ़ जाती है। साथ ही अनिष्ट की आंशका भी खत्म हो जाती है। इसे दुख को खत्म करने वाला और मनोकामना पूरी करने वाला योग भी कहा जाता है। इस शुभ योग में सूर्य को अर्घ्य देने से रोग खत्म होते हैं और उम्र बढ़ती है। (पं.मिश्रा के मुताबिक)

18 को नहाय खाय और 21 को आखिरी अर्घ्य
सूर्य देवता को समर्पित चार दिवसीय छठ पर्व आज से शुरू हो रहा है। ये व्रत संतान की लंबी उम्र की कामना से किया जाता है। इस महोत्सव में नहाय-खाय का विधान 18 नवंबर को किया जाएगा। 19 को खरना, 20 को संध्याकालीन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और इस पर्व के आखिरी दिन 21 तारीख को उदय होते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण करके व्रत पूरा किया जाएगा।

किस दिन कौन सा शुभ योग
18 नवंबर: रवियोग सूर्योदय से सुबह 10.40 तक
19 नवंबर: रवियोग सुबह 9:40 से दोपहर 2:30 तक
20 नवंबर: सर्वार्थसिद्धि और रवियोग, पूरे दिन
21 नवंबर: द्विपुष्कर योग पूरे दिन, सर्वार्थसिद्धि और रवियोग योग सुबह 9:55 तक

36 घंटे तक रहते हैं बिना पानी पीए
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि से होती है और समापन सप्तमी को होता है। छठ व्रत करने वाले लगातार 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं। इस व्रत में शुद्धता पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है, जिससे इसे कठिन व्रतों में एक माना जाता है।

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