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बंगाल में 1 अक्टूबर से शुरू होगा दुर्गा उत्सव:काल बोधन से शुरू होगी पूजा, 4 को धुनुची नृत्य और 5 को सिंदूर उत्सव के साथ होगा मूर्ति विसर्जन

4 महीने पहले
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पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा पांच दिनों तक होती है। जो कि इस बार 1 से 5 अक्टूबर तक रहेगी। इसमें नवरात्रि की छठी, सातवीं, आठवीं, नौवीं तिथि और विजयादशमी रहेगी। छठी तिथि पर कल्पारम्भ यानी देवी आह्वान होता है। जिसे अकाल बोधन कहते हैं और दशहरे पर देवी विसर्जन किया जाता है। इन दिनों की महा पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी, सरस्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की पूजा होती है।

श्रीराम की शक्ति आराधना से जुड़ी है परंपरा
भगवान राम ने रावण को हराने के लिए पहली बार अश्विन महीने में देवी पूजा की थी। इसलिए बंगाल में इसे अकाल बोधन कहते हैं। यानी असमय पूजा। कथा के मुताबिक रावण को हराने के लिए भगवान राम को शक्ति चाहिए थी। इसलिए उन्होंने देवी की उपासना 108 नील कमल से की।
कहा जाता है देवी ने राम की परीक्षा लेने के लिए एक फूल छिपा लिया था। ऐसे में राम परेशान हुए। उनकी आंखें नील कमल सी थी, इसलिए जब वो अपनी एक आंख निकालकर मां पर चढ़ाने लगे तो देवी ने विजयी होने का आशीर्वाद दिया। फिर नवरात्रि में अष्टमी-नवमी की रात राम-रावण के बीच युद्ध हुआ था। इसलिए आज भी आधी रात को विशेष पूजा होती है।

अकाल बोधन (1 अक्टूबर): इस दिन मंत्रों के जरिये देवी को जगाया जाता है। साथ ही कलश स्थापना कर के बिल्वपत्र के पेड़ की पूजा कर के देवी को निमंत्रण देकर मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। साथ ही विधि विधान से दुर्गा पूजा का संकल्प लिया जाता है। कल्पारंभ यानी अकाल बोधन की विधि घटस्थापना की तरह ही होती है। कल्पारम्भ की पूजा सुबह जल्दी करने का विधान है।

नवपत्रिका पूजा (2 अक्टूबर): नवरात्रि की सप्तमी पर सुबह नव पत्रिका पूजा यानी नौ तरह की पत्तियों से मिलाकर बनाए गुच्छे से देवी आह्वान और पूजा करते हैं। इसे ही नवपत्रिका पूजा कहते हैं। इनमें केला, हल्दी, दारू हल्दी, जयंती, बिल्व पत्र, अनार, अशोक, चावल और अमलतास के पत्ते होते हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले गंगा या किसी पवित्र नदी में महास्नान होता है। फिर इन पत्तों को देवी पत्तियों या सफेद अपराजिता के पौधों की टहनियों से बांधा जाता है। लड़कियों के लिए सप्तमी खास होती है। वे पीली साड़ी पहनकर मां के मंडप में जाती हैं और मनोकामना पूरी होने के लिए प्रार्थना करती हैं।

धुनुची नृत्य (3 और 4 अक्टूबर): धुनुची नृत्य सप्तमी से शुरू होता है और अष्टमी और नवमी तक चलता है। ये असल में शक्ति नृत्य है। बंगाल पूजा परंपरा में ये नृत्य मां भवानी की शक्ति और ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। धुनुची में नारियल की जटा, रेशे और हवन सामग्री यानी धुनी रखी जाती है। उसी से मां की आरती भी की जाती है।

सिंदूर खेला और मूर्ति विसर्जन (5 अक्टूबर): विजयदशमी पर्व, देवी पूजा का आखिरी दिन होता है। इस पर्व के आखिरी दिन महिलाएं सिंदूर खेलती हैं। इसमें वो एक-दूसरे को सिंदूर रंग लगाती हैं। इसी के साथ बंगाल में दुर्गा उत्सव पूरा हो जाता है। इस दिन देवी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है और पूजा करने वाले सभी लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं और मिठाइयां देते हैं।

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