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हिंदू कैलेंडर की पहली एकादशी 7 को:होली और नवरात्रि के बीच पड़ने वाली ये एकादशी दिलाती है पापों से मुक्ति

8 दिन पहले
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  • नवरात्रि के पहले पापमोक्षिनी एकादशी बुधवार को, भगवान विष्णु की पूजा के साथ होगी कथा

चैत्र महीने के कृष्णपक्ष की पाप मोक्षिनी एकादशी 7 अप्रैल को रहेगी। एकादशी तिथि खासतौर से भगवान विष्णु को समर्पित होती है और इस दिन उनकी पूजा विशेष फल देने वाली होती है। पाप मोक्षिनी एकादशी का विशेष महत्व है, जो होली और नवरात्रि के बीच में पड़ती है। इस दिन बहुत से लोग व्रत रखने के साथ भगवान सत्यनारायण की कथा और विष्णु सहस्त्रनाम पाठ भी करते हैं। नाम के मुताबिक इस एकादशी पर व्रत और पूजा करने से तमाम तरह के पाप और तकलीफों से छुटकारा मिलता है। साथ ही इस दिन अन्न और जलदान करने से कई गुना पुण्य मिलता है।

पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र बताते हैं कि एकादशी तिथि 7 अप्रैल को सूर्योदय से शुरू होकर पूरे दिन रहेगी। इसलिए बुधवार को ही व्रत और पूजा करनी चाहिए। इस दिन सुबह उठकर नहाने के बाद साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस व्रत में पीले कपड़े पहनना फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु को पीला रंग पसंद है। व्रत के साथ ही दान करने से कभी खत्म नहीं होने वाला पुण्य मिलता है। ये एकादशी पापों का नाश करने वाली है। इस एकादशी का व्रत करने से कल्याण होता है। जो भी अच्छे कामों को करने का संकल्प लेता है उसके वो काम इस एकादशी की पूजा के फलस्वरूप बिना रुकावट पूरे होते हैं। आर्थिक संकट भी दूर होता है।

भगवान कृष्ण ने सुनाई थी युधिष्ठिर को कथा पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजा मान्धाता ने एक समय लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने-अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा को जवाब देते हुए ऋषि ने कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नाम के वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। इस वन में एक दिन मंजुघोषा नाम की अप्सरा की नजर ऋषि पर पड़ी तो वो उन पर मोहित हो गई और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगी। जिससे ऋषि की तपस्या भंग हो गई। इससे गुस्सा होकर उन्होंने अप्सरा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया। अप्सरा दुःखी होकर वह ऋषि से माफी मांगने लगी और श्राप से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी। ऋषि ने उसे विधि सहित चैत्र कृष्णपक्ष एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। इस व्रत से अप्सरा पिशाच योनि से मुक्त हो गई। पाप से मुक्त होने के बाद अप्सरा को सुन्दर रूप मिला और वो स्वर्ग चली गई।

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