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चैत्र नवरात्रि 13 से:महिषासुर का वध करने के लिए प्रकट हुई थीं देवी दुर्गा, शिवजी ने त्रिशूल और विष्णुजी ने दिया था सुदर्शन चक्र

25 दिन पहले
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  • दुर्गा सत्पशती में बताई गई है देवी अवतार की कथा, चैत्र नवरात्रि में देवी चढ़ाएं लाल फूल

अभी चैत्र मास चल रहा है और इस मास की अमावस्या के बाद चैत्र नवरात्रि शुरू हो जाती है। मंगलवार, 13 अप्रैल से बुधवार, 21 अप्रैल तक चैत्र नवरात्रि रहेगी। इन दिनों में देवी मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करनी चाहिए। देवी मां ने दैत्यों का वध करने के लिए कई अवतार लिए हैं। देवी मां ने महिषासुर का वध करने के लिए दुर्गा के रूप में अवतार लिया था। इसी वजह से देवी को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतार के बारे में बताया गया है। पुराने समय में महिषासुर नाम के एक असुर ने देवताओं को स्वर्ग के निकालकर वहां अपना अधिकार कर लिया था। कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर पा रहा था।

स्वर्ग से निकलकर सभी देवता शिवजी और विष्णुजी के पास पहुंचे। महिषासुर के आंतक से शिवजी और विष्णुजी क्रोधित हो गए। उस समय सभी देवताओं के मुख के एक तेज प्रकट हुआ, ये तेज एक देवी रूप में बदल गया।

शिवजी के तेज से देवी का मुख, यमराज के तेज से केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, सूर्य के तेज से पैरों की उंगलियां, कुबेर के तेज से नाक, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीन नेत्र, संध्या के तेज से भृकुटि और वायु के तेज से देवी के कानों की उत्पत्ति हुई। इस तरह देवताओं के तेज से देवी उत्पन्न हुई।

सभी देवताओं ने अवतरित हुई देवी को अपनी-अपनी शक्तियां भेंट में दीं। शिवजी ने त्रिशूल और अग्निदेव ने अपनी शक्ति देवी को प्रदान की। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र दिया। वरुणदेव ने शंख, पवनदेव ने धनुष-बाण, देवराज इंद्र ने वज्र और घंटा, यमराज ने कालदंड भेंट किया। प्रजापति दक्ष ने स्फटिक की माला, ब्रह्मादी ने कमंडल, सूर्यदेव ने अपना तेज प्रदान किया। समुद्रदेव ने आभूषण भेंट किए। सरोवरों ने कभी न मुरझाने वाली फूलों की माला, कुबेरदेव ने शहद से भरा दिव्य पात्र, पर्वतराज हिमालय ने सिंह भेंट में दिया। ​​​​​​​

देवताओं से मिली इन शक्तियां से देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। महिषासुर का वध करने की वजह से ही देवी को महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। चैत्र नवरात्रि में देवी दुर्गा की विशेष पूजा करनी चाहिए। अगर पूजा के लिए ज्यादा समय न हो तो देवी के दर्शन रोज करें और लाल फूल जरूर चढ़ाएं।

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