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सेहत और साधना:मौसम परिवर्तन के समय होती है आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि; इन दिनों उबालकर पीते हैं पानी और नहीं खाते अन्न

2 महीने पहले
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आषाढ़ मास के दौरान आने वाली गुप्त नवरात्रि 30 जून से शुरू होगी और 8 जुलाई तक रहेगी। धर्म ग्रंथों में बताए गए चार नवरात्र, ऋतु परिवर्तन के समय आते हैं। इसलिए ये धर्म के साथ सेहत के लिए भी खास होते हैं। ऋतु परिवर्तन होने से शारीरिक और मानसिक बदलाव भी होते हैं। इनसे होने वाले नुकसान से बचने के लिए सनातन धर्म में नवरात्रि की व्यवस्था की गई है। जिसमें रहन-सहन और खानपान से जुड़े कुछ बदलाव करने पड़ते हैं और कुछ बातों का ध्यान रखना होता है। जिससे बीमारियों से बचा जा सकता है।

हिंदू कैलेंडर: साल की दूसरी नवरात्रि
हिंदू कैलेंडर के चैत्र महीने के शुक्लपक्ष में पहली नवरात्रि आती है। वसंत ऋतु में होने के कारण इसे वासंती नवरात्रि भी कहा जाता है। इसके बाद आषाढ़ महीने में गुप्त नवरात्रि आती है। जो कि साल की दूसरी नवरात्रि होती है। फिर शरद ऋतु यानी अश्विन महीने में भी नवरात्र होते है जिनका समापन दशहरे पर होता है। साल की आखिरी और चौथी नवरात्रि माघ महीने में यानी जनवरी और फरवरी के बीच आती है। ये भी गुप्त नवरात्रि होती है। माघ व आषाढ़ की नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है।

आषाढ़ नवरात्रि के नियम
इस गुप्त नवरात्रि के दौरान सिद्धि पाने के लिए मंत्र जाप, पूजा-पाठ, हवन और साधना गुप्त रूप से करने का विधान है। इसलिए इन दिनों में ज्यादातर समय घर पर ही रहा जाता है। इस समय साफ-सफाई पर आम दिनों से ज्यादा ध्यान दिया जाता है। गुप्त नवरात्र में पानी उबालकर पिया जाता है। अन्न नहीं खाया जाता। सिर्फ रसीले फल खाते हैं।

इन दिनों में जो लोग साधना और पूजा-पाठ नहीं करते वो भी मसालेदार और तली, भुनी चीजों से परहेज रखते हैं या कम ही खाते हैं। देवी साधना करने वालों को दिन में सोने की मनाही होती है। इसलिए गुप्त नवरात्र में सिर्फ रात में ही सोते हैं। इन बातों का ध्यान रखने से सेहत अच्छी रहती है और साधना भी सफल होती है।

नवरात्रि के दौरान क्या करें
बनारस के वैद्य डॉ. प्रशांत मिश्र का कहना है कि आयुर्वेद के मुताबिक आषाढ़ नवरात्रि के दौरान नीम, लौंग, दालचीनी और हल्दी का इस्तेमाल ज्यादा करना चाहिए। इनके साथ ही त्रिफला चूर्ण को गरम पानी के साथ लेना चाहिए और गिलोय भी खाना चाहिए। वहीं, इन दिनों टमाटर, अचार, दही और अन्य खट्‌टी चीजें खाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से व्रत-उपवास के दौरान शारीरिक परेशानी नहीं होती।

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