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जीवन प्रबंधन:लगातार अभ्यास करते रहने से हम किसी भी काम में दक्ष हो सकते हैं, बार-बार रस्सी रगड़ने से पत्थर पर भी पड़ सकते हैं

9 महीने पहले
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  • एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर किया था धनुष विद्या का अभ्यास और वह इस विद्या में पारंगत हो गया था

किसी भी काम में सफलता के लिए उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है। अभ्यास के बिना लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल होता है। अभ्यास का महत्व बताने के लिए एक दोहा बहुत प्रचलित है।

करत-करत अभ्यास के जङमति होत सुजान।

रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान।।

इस दोहे का अर्थ यह है कि जब साधारण रस्सी को बार-बार किसी पत्थर पर रगड़ा जाता है तो पत्थर पर भी निशान पड़ सकता है। निरंतर अभ्यास से कोई मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है। लगातार अभ्यास करने के लिए आलस्य को त्यागना जरूरी है। अज्ञान को दूर करने के लिए पूरी एकाग्रता से मेहनत करनी होगी।

एकलव्य की कथा से समझ सकते हैं अभ्यास का महत्व

महाभारत में द्रोणाचार्य और एकलव्य की कथा हमें अभ्यास का महत्व बताती है। कथा के अनुसार एकलव्य द्रोणाचार्य से धनुष विद्या सीखना चाहता था, लेकिन द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया था। इसके बाद एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा की और धनुष विद्या का अभ्यास शुरू कर दिया।

लगातार अभ्यास करते रहने से एकलव्य धनुष विद्या में पारंगत हो गया था। एक दिन द्रोणाचार्य पांडवों के साथ उस क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे, जहां एकलव्य अभ्यास करता था। उस समय पांडवों का कुत्ता एकलव्य के सामने भौंकने लगा। इससे एकलव्य की एकाग्रता भंग हो रही थी। तब एकलव्य ने कुत्ते का मुंह बाणों से बंद कर दिया, लेकिन कुत्ते मुंह से खून की एक बूंद भी नहीं निकली थी।

जब कुत्ते को द्रोणाचार्य ने देखा तो वे हैरान रह गए थे। क्योंकि, इतनी कुशलता बाण चलाना किसी महान यौद्धा का ही काम था। वे यौद्धा को ढूंढते हुए एकलव्य के पास तक पहुंच गए। एकलव्य की कुशलता देखकर द्रोणाचार्य ने सोचा कि ये अर्जुन से भी अच्छा धनुर्धर बन सकता है। ये सोच द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांग लिया था। ताकि भविष्य में अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाए।

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