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कूर्म जयंती 15 मई को:पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने लिया था कूर्म अवतार, कछुए से शुरू हुई जीवों की उत्पत्ति

12 दिन पहले
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वैशाख महीने की पूर्णिमा को कूर्म जयंती मनाई जाती है। ये पर्व इस बार 15 मई, रविवार को है। कूर्म यानी कछुआ ये भगवान विणु का ही एक अवतार है। दस अवतारों में इसका नंबर क्या है, इस बारे में पुराणों में अलग-अलग बातें बताई गई हैं। ज्यादातर ग्रंथों में इस अवतार के बारे में कहा गया है कि जब समुद्र मंथन हो रहा था तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप लेकर अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को संभाला था। इस अवतार के लिए ज्यादातर ग्रंथों में ये भी माना जाता है कि कछुए से ही मनुष्य जीवन की शुरुआत हुई।

समुद्र मंथन के लिए हुआ कूर्म अवतार
एक बार महर्षि दुर्वासा ने इंद्र को श्राप देकर उनकी सुख-समृद्धि खत्म कर दी थी। इंद्र भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन के लिए कहा। तब भगवान विष्णु के कहे अनुसार राक्षस और देवता मंथन के लिए तैयार हो गए। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती बनाया गया।

देव-राक्षसों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर मंथन करना शुरू किया लेकिन पर्वत का आधार नहीं होने के कारण वो समुद्र में डुबने लगा। ये देखकर भगवान विष्णु ने बहुत बड़े कूर्म (कछुए) का रूप लेकर समुद्र में मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया। इससे पर्वत तेजी से घूमने लगा और समुद्र मंथन पूरा हुआ।

वेद और पुराणों में कूर्म अवतार
नृसिंह पुराण और भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार है।
शतपथ ब्राह्मण, महाभारत और पद्म पुराण में कहा गया है कि संतति प्रजनन हेतु प्रजापति, कच्छप का रूप धारण कर पानी में संचरण करता है।
लिंग पुराण के अनुसार पृथ्वी रसातल को जा रही थी, तब विष्णु ने कच्छप रूप में अवतार लिया।
पद्म पुराण में बताया गया है कि समुद्र मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत रसातल में जाने लगा तो भगवान विष्णु ने कछुए का रूप लिया और उसे अपनी पीठ पर संभाला।
कूर्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने कच्छपावतार से ऋषियों को जीवन के चार लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) का वर्णन किया था।

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