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तिल उत्सव का आखिरी व्रत 25 को:बुधवार के शुभ संयोग में मनेगी तिलकुंद चतुर्थी, माघी चौथ पर तिल से होगी गणेशजी की पूजा

12 दिन पहले
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माघ महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को तिलकुंद चतुर्थी का व्रत किया जाता है। इसे विनायकी और वरद चतुर्थी भी कहते हैं। इस बार ये 25 जनवरी को है। इस दिन बुधवार का शुभ संयोग बन रहा है। जिससे व्रत और गणेशजी की पूजा का शुभ फल और बढ़ जाएगा। इस दिन भगवान श्रीगणेश और चंद्रमा की पूजा की जाएगी। इस व्रत को करने से जॉब और बिजनेस की परेशानियां दूर हो जाती हैं। मानसिक शांति भी मिलती है। घर में खुशहाली बढ़ती है।

शुभ योग और ग्रह स्थिति
माघी चतुर्थी पर पद्म और रवियोग बन रहे हैं। साथ ही बुधवार भी रहेगा। गणेश पुराण के मुताबिक इस वार को गणेश जी प्रकट हुए थे। वहीं, इस तिथि पर बृहस्पति भी खुद की राशि में रहेगा। ग्रह-योगों की शुभ स्थिति बनने से इस दिन किए गए व्रत और पूजा-पाठ का शुभ फल और बढ़ जाएगा।

दान का महत्व
माघ महीना होने के कारण इस चतुर्थी तिथि पर दान का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान गणेश को तिल के लड्डूओं का भोग लगाया जाता है। इसके बाद प्रसाद के रूप में इन्हें बांटा जाता है। इनके अलावा जरूरतमंद लोगों को ऊनी कपड़े, कंबल और भोजन दिया जाता है। वहीं खासतौर से तिल से बनी खाने की चीजों का दान करने से हर तरह के पाप खत्म होते हैं।

व्रत और पूजा विधि
तिलकुंद चतुर्थी पर सुबह जल्दी नहाकर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद भगवान श्री गणेश की पूजा और व्रत का संकल्प लें। फिर पूजन करें। पूजा करते वक्त ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र बोलें और गणेश जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराएं फिर फल, फूल, चावल, रौली, मौली चढ़ाएं। इसके बाद तिल अथवा तिल-गुड़ से बनी मिठाइयों और लड्डुओं का भोग लगाएं। फिर भगवान गणेश को धूप-दीप दर्शन करवाएं। शाम को कथा सुनने के बाद गणेशजी की आरती करें।

क्या है मान्यता
मान्यता है कि इस चतुर्थी के दिन व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जहां सभी कष्ट दूर हो जाते हैं, वहीं इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति भी होती है। इस दिन तिल दान करने का महत्व होता है। इस दिन गणेशजी को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। इसलिए इसे तिलकुंद चतुर्थी कहा जाता है।

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