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महाष्टमी आज:देवी पूजन के लिए 4 मुहूर्त, त्रेतायुग से चली आ रही है अष्टमी तिथि पर देवी महापूजा की परंपरा

11 दिन पहले
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  • श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था दुर्गाष्टमी पर देवी पूजा का महत्व, भविष्य पुराण में है इसका जिक्र
  • अष्टमी पर संधिकाल में होती है देवी की महापूजा पूजा, क्योंकि इस काल में ही प्रकट हुई थीं देवी चामुंडा

नवरात्रि की अष्टमी पर देवी की विशेष पूजा की परंपरा है। जो कि त्रेतायुग से चली आ रही है, जब श्रीराम ने रावण पर जीत की कामना से शक्ति आराधना की थी। इसके बाद द्वापर युग में भी श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को शरद ऋतु की अष्टमी तिथि (दुर्गाष्टमी) पर देवी पूजन की विधि बताई थी। देवी महापुराण के मुताबिक अष्टमी पर देवी प्रकट हुई थीं और इस तिथि पर भैरव भी प्रकट हुए थे। मार्कंडेय पुराण में भी दुर्गाष्टमी के बारे में कहा गया है कि इस तिथि पर देवी पूजा से हर परेशानी दूर हो जाती है और कभी दरिद्रता नहीं आती।

दुर्गाष्टमी पर महापूजा से हर तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं और दुश्मनों पर जीत मिलती है। इस दिन देवी पूजा से सुख-समृद्धि, यश, कीर्ति और आरोग्यता मिलती है।
दुर्गाष्टमी पर महापूजा से हर तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं और दुश्मनों पर जीत मिलती है। इस दिन देवी पूजा से सुख-समृद्धि, यश, कीर्ति और आरोग्यता मिलती है।

संधि काल पूजा: देवी चामुंडा के प्राकट्य का समय
नवरात्रि के दौरान संधि पूजा का विशेष महत्व है। ये उस वक्त की जाती है जब अष्टमी तिथि खत्म हो रही हो और नवमी की शुरुआत हो। इसमें अष्टमी तिथि के आखिरी 24 मिनिट और नवमी के शुरुआती 24 मिनिट यानी कुल 48 मिनट होते हैं। इस संधिकाल को देवी पूजा के लिए बहुत ही खास माना जाता है। ये विशेष समय इस बार 13 अक्टूबर, बुधवार को रात 10.56 से 11.44 तक रहेगा। माना जाता है कि इसी संधि काल में देवी चामुंडा प्रकट हुई थीं और चंड-मुंड नाम के राक्षसों को मारा था। इस विशेष काल में देवी के चामुंडा रूप की पूजा करने से दुश्मनों पर जीत और बीमारियों से छुटकारा मिलता है।

कन्या पूजा से नवरात्रि का पूरा फल
देवीभागवत पुराण का कहना है कि अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन और उनको भोजन करवाने से पूरी नवरात्रि पूजा का फल मिल जाता है। ऐसा करने से देवी प्रसन्न होती हैं। रुद्रमालय तंत्र में कहा गया है कन्या पूजन से लक्ष्मी प्राप्ति होती है। कन्याओं की पूजा से विद्या प्राप्त होती है और इससे दस महाविद्यायें प्रसन्न होती हैं। अष्टमी तिथि पर 2 से 10 साल तक की कन्याओं की पूजा करनी चाहिए। इन कन्याओं के साथ एक बालक को भैरव रूप मानकर भोजन करवाना चाहिए।

श्रीकृष्ण ने बताई देवी पूजन की विधि
भविष्य पुराण के उत्तरपर्व में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद है। जिसमें दुर्गाष्टमी पूजन का जिक्र है। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा जब सूर्य कन्या राशि में हो तब आश्विन महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि पर देवी की महापूजा करनी चाहिए। उस दिन काली, सर्वमंगला, माया, कात्यायनी, दुर्गा, चामुंडा और शंकरप्रिया आदि अनेक नामों से पूजा करनी चाहिए और इन रुपों से देवी दुर्गा का ध्यान करना चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये पूजन सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में होता है और कलियुग में भी होगा। देव, दानव, राक्षस, गंधर्व, नाग, यक्ष, किन्नर और मनुष्य अष्टमी-नवमी पर मां दुर्गा की पूजा करते हैं।

ज्योतिष: जीत देने वाली तिथि है अष्टमी
ज्योतिष में अष्टमी तिथि को बलवती और व्याधि नाशक तिथि कहा गया है। इसके देवता शिवजी हैं। इसे जया तिथि भी कहा जाता है। नाम के अनुसार इस तिथि में किए गए कामों में जीत मिलती है। इस तिथि में किए गए काम हमेशा पूरे होते हैं। अष्टमी तिथि में वो काम करने चाहिए जिसमें विजय प्राप्त करनी हो। मंगलवार को अष्टमी तिथि का होना शुभ माना जाता है। वहीं श्रीकृष्ण का जन्म भी अष्टमी तिथि पर ही हुआ था।

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