महात्मा गांधी की सीख:समाज की भलाई करना चाहते हैं तो किसी भी काम को छोटा न समझें, अपने नुकसान के बाद भी दूसरों का भला करें

2 महीने पहले
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आज (30 जनवरी) राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्य तिथि है। गांधी जी से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जिसमें जीवन प्रबंधन के सूत्र छिपे हैं। उनके विचारों को, उनके सूत्रों को जीवन में उतार लिया जाए तो हमारी कई समस्याएं खत्म हो सकती हैं। यहां जानिए गांधी से जुड़े ऐसे प्रसंग, जिनकी सीख खासतौर पर सेवा करने वाले वाले लोगों को ध्यान रखनी चाहिए...

  • समाज की भलाई करने वाले के लिए कोई भी काम छोटा नहीं होता है

एक दिन महात्मा गांधी के पास एक लड़का आया और बोला कि गांधी जी मैं भी देश की सेवा करना चाहता हूं। इसलिए मुझे भी आपके साथ काम करने का मौका दीजिए।

गांधी जी ने उस लड़के को देखा और बोले कि ठीक है। मैं अभी चरखा चला रहा हूं तो तुम ये सूत इकट्ठा कर दो।

लड़के ने गांधी जी के द्वारा बताया गया काम कर दिया। इसके बाद गांधी जी ने कहा कि कुछ बर्तन रखे हुए हैं, उन्हें साफ कर दो।

उस लड़के ने ये काम भी कर दिया। इसके बाद गांधी जी ने उसे आश्रम में सफाई करने का काम दे दिया।

इस गांधी जी उस लड़के से छोटे-छोटे काम कराने लगे। कुछ दिन बीत गए। उस लड़के को ये सारे काम अच्छे नहीं लग रहे थे। एक दिन लड़के ने गांधी जी से कहा कि मैं अब यहां नहीं रुक सकता। मैं जा रहा हूं।

गांधी जी ने उससे पूछा कि लेकिन क्यों जा रहे हो?

लड़के ने जवाब दिया कि मैं पढ़ा-लिखा लड़का हूं, अच्छे परिवार से हूं। आप जो काम मुझसे करवा रहे हैं, ये काम मेरे लिए सही नहीं है।

गांधी जी ने उस लड़के की बात शांति से सुनी और उसे समझाते हुए कहा कि मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। जो लोग देश सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए सभी काम एक समान होते हैं। सेवा करने वाले के लिए कोई भी काम छोटे-बड़े नहीं होते हैं। सेवा भावी सिर्फ सेवा करता है।

  • अपने नुकसान के बाद भी दूसरों की भलाई के लिए काम करें

गांधी जी यात्राएं करते रहते थे। एक बार वे रेल से यात्रा कर रहे थे। एक स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो गांधी जी कुछ देर के लिए नीचे उतरे। गांधी जी को देखकर लोगों की भीड़ लग गई। गांधी जी भीड़ से घिरे हुए थे और उनकी रेलगाड़ी चलने लगी।

भीड़ से बाहर निकलते हुए गांधी जी तेजी से अपने डिब्बे में चढ़ गए, लेकिन उनकी एक चप्पल नीचे गिर गई और रेल के नीचे पटरियों के बीच चली गई।

रेल चल रही थी, गांधी जी डिब्बे के गेट पर खड़े होकर विचार करने लगे और फिर उन्होंने अपनी दूसरी चप्पल भी वहीं गिरा दी।

ये घटना देख रहे व्यक्ति ने गांधी जी से पूछा कि आपने दूसरी चप्पल भी क्यों गिरा दी?

गांधी जी ने कहा कि मेरी एक चप्पल तो गिर चुकी है और मेरे पास एक चप्पल रह गई तो मैंने सोचा कि अब ये एक चप्पल मेरे किसी काम नहीं है। इसलिए मैंने दूसरी चप्पल भी यहीं गिरा दी, ताकि किसी व्यक्ति को ये दोनों चप्पलें मिलेंगी तो उसके काम आ जाएंगी।

इस किस्से में गांधी जी ने संदेश दिया है कि अगर हमारा नुकसान हो जाए और हम उसके बाद भी किसी भला कर सकते हैं तो इस काम में पीछे नहीं हटना चाहिए।