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त्योहारों वाला हफ्ता:इस सप्ताह 4 बड़े पर्व; पौष अमावस्या, लोहड़ी, पोंगल और उत्तरायण, चारों त्योहारों का सार है त्याग- खुशी-उल्लास

13 दिन पहले
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  • 12 जनवरी को पौष अमावस्या, 13 को लोहड़ी और पोंगल, 14 को मकर संक्रांति और मकरविलक्कू

ये सप्ताह खुशी, समृद्धि और उल्लास के साथ शुरू हो रहा है। इस हफ्ते पौष अमावस्या, लोहड़ी, पोंगल और मकर संक्रांति जैसे पर्व रहेंगे। इन त्योहारों का सार ही खुशी, त्याग, समृद्धि और उल्लास है। 12 जनवरी को पौष अमावस्या पर तीर्थ स्नान और दान किया जाता है। इसके अगले दिन लोहड़ी और पोंगल है। वहीं, 14 को मकर संक्रांति मनाई जाएगी। इन सभी त्योहारों पर जरूरतमंद लोगों को दान दिया जाता है। जो कि त्याग की भावना को बताता है। इस त्याग से खुशी और उल्लास मिलता है। इसलिए ये सभी पर्व खास है।

मकर संक्रांति
ये नई फसलों के आने की खुशी का भी पर्व है, इसी दिन से खरमास भी खत्म होता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी में जाने को संक्रांति कहते हैं। इस दिन सूर्य मकर राशि में आता है इसलिए ये मकर संक्रांति पर्व हो गया है। ये पर्व फसलों आने की खुशी में भी मनाया जाता है। इस दिन गुड़ और तिल की मिठाइयां बनाई जाती हैं। इस दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं इसलिए माना जाता है कि इस पर्व पर पवित्र नदी में नहाने के बाद श्रद्धानुसार दान और पूजा करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इसी दिन खरमास भी खत्म होता है। इसलिए शुभ कामों की शुरुआत हो जाती है।

अच्छे दिन की शुरुआत: भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 महीने के शुभ समय में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर छोड़ने से इंसान का पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इसलिए भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।

लोहड़ी
तिलोड़ी अब लोहड़ी हो गया, पंजाब में कई जगहों पर इसे लोही या लोई कहते हैं। लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था। लोहड़ी 13 जनवरी, पौष महीने में मनाया जाता है। इस दिन लोग लकड़ी जलाकर आग के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। इस पर्व के बारे में ये भी कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी लोई की याद में ये पर्व मनाया जाता है। ये भी मान्यता है कि सुंदरी एवं मुंदरी नाम की लड़कियों को सौदागरों से बचाकर दुल्ला भट्टी ने हिंदू लड़कों से उनकी शादी करवा दी थी। पौराणिक मान्यता के मुताबिक सती के त्याग के रूप में भी ये त्योहार मनाया जाता है।

त्याग और प्रकृति के आभार का पर्व: लोहड़ी, त्याग, एकता और प्रकृति का शुक्रिया करने का पर्व है। जिस तरह हवन में दी गई धान की आहुति देवताओं तक पहुंचती है। उसी तरह लोहड़ी पर भी पहली फसल कटने के बाद सभी लोग मिलकर उसे शाम को अग्नि को भेट करते हैं। ऐसा करते हुए प्रकृति और देवताओं के प्रति आभार प्रकट किया जाता है।

पोंगल
दक्षिण भारत में इसे धान की फसल समेटने के बाद खुशी जाहिर करने के लिए मनाते हैं। समृद्धि के लिए इस पर्व के दौरान जल के देवता, इन्द्रदेव, सूर्य और खेतिहर मवेशियों की पूजा की जाती है। पोंगल यानी खिचड़ी का त्योहार। जो सूर्य के उत्तरायण होने के पुण्यकाल में मनाया जाता है। ये पर्व दक्षिण भारत में धान की फसल समेटने के बाद लोग आपस में खुशी बांटने करने के लिए मनाते हैं और भगवान से अगली फसल के अच्छे होने की प्रार्थना करते हैं।
पोंगल उत्सव 4 दिन तक चलता है। पहले दिन भोगी, दूसरे दिन सूर्य, तीसरे दिन मट्टू और चौथे दिन कन्या पोंगल मनाया जाता है। इस त्योहार पर गाय के दूध को उबालना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन खासतौर पर खीर बनाई जाती है। मिठाई और मसालेदार चीजें भी बनाई जाती हैं। चावल, दूध, घी और शकर से खाना तैयार कर सूर्यदेव को भोग लगाया जाता है।

बुराइयां छोड़ अच्छाइयों को अपनाने का पर्व: ये पर्व बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों को अपनाने की सीख देता है। साथ ही ये प्रकृति को धन्यवाद देने का त्योहार है। पोंगल के पहले अमावस्या पर लोग बुरी रीतियों का छोड़कर अच्छी चीजों को अपनाने की प्रतिज्ञा करते हैं। ये काम पोही कहलाता है। जिसका अर्थ है- जाने वाली। पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है। पोही के अगले दिन यानी प्रतिपदा को दिवाली की तरह पोंगल को बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

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