मान्यताएं:सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या से जुड़ी है पितृ अमावसु की कथा, इस तिथि पर किए जाते हैं सभी पितरों के लिए श्राद्ध कर्म

2 महीने पहले
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बुधवार, 6 अक्टूबर को पितृ पक्ष की सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या है। इस दिन पितृ पक्ष खत्म हो जाएगा। इस अमावस्या पर सभी पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने का महत्व काफी अधिक है। अगर पितृ पक्ष में किसी मृत व्यक्ति का श्राद्ध करना भूल गए हैं या किसी की मृत्यु तिथि मालूम नहीं है तो उसका श्राद्ध कर्म इस अमावस्या पर किया जा सकता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार मान्यताओं है कि कोई भी व्यक्ति जो पूरे साल में कभी भी श्राद्ध-तर्पण नहीं करता है, अगर वह भी इस तिथि पर श्राद्ध-तर्पण कर लेता है तो उसे सभी तिथियों के श्राद्ध कर्म के बराबर पुण्य फल मिल जाता है।

पितृ अमावसु से जुड़ी है सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या से जुड़ी कथा

पुराने समय में अग्निष्वात और बर्हिषपद नाम के पितृ देव थे। उनकी मानस कन्या थीं अक्षोदा। अक्षोदा ने अश्विन मास की अमावस्या पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। तपस्या से प्रसन्न होकर सभी पितर देवता अक्षोदा के सामने प्रकट हुए। उस समय अक्षोदा का पूरा ध्यान एक तेजस्वी पितर अमावसु की ओर ही था और वह उन्हें अपलक निहारती रहीं, उसने अमावसु से कहा, "वरदान में आप मुझे स्वीकारें मैं आपका संग चाहती हूं।'

अक्षदा की ये बात सुनकर सभी पितर देवता क्रोधित हो गए। उन्होंने उसे शाप दिया कि वह पितर लोक से पृथ्वी लोक जाएगी। ये सुनकर अक्षोदा को अपनी गलती का अहसास हुआ हुआ और वह क्षमा याचना करने लगी। तब पितरों ने दयाकर उससे कहा कि वह मत्स्य कन्या के रूप में जन्म लेगी।

भगवान ब्रह्मा के वंशज महर्षि पाराशर उस मत्स्य कन्या को पति रूप में मिलेंगे और उसके गर्भ से भगवान वेद व्यास जन्म लेंगे। इसके बाद फिर श्राप मुक्त होकर वह फिर से पितर लोक में वापस आ जाएगी।

पितृ अमावसु को पितर देवताओं ने दिया वरदान

सभी पितरों ने अमावसु की प्रशंसा की और वरदान दिया कि आपने सौंदर्य और स्त्री के आगे अपने मन को भटकने नहीं दिया और अपने संयम और नियम पर आप टिके रहे, इसलिए आज से ये तिथि आपके नाम से अमावसु के रूप में जानी जाएगी। मान्यता है कि तभी से ये दिन पितृमोक्ष अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध हुआ है।