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देवी मां की 6 कथाएं:द्वापर युग में श्रीकृष्ण जन्म के समय ही अवतरित हुई थीं योगमाया, देवी दुर्गा एक तिनके से तोड़ा था देवताओं का घमंड

11 दिन पहले
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नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा करने के साथ ही देवी कथाएं सुनने और पढ़ने का महत्व काफी अधिक है। मान्यता है कि ऐसा करने से अक्षय पुण्य मिलता है और सकारात्मकता बढ़ती है। देवी दुर्गा ने समय-समय पर अपने भक्तों के कष्ट दूर करने के लिए अलग-अलग अवतार लिए हैं। प्राचीन समय में महिषासुर को ब्रह्मा जी से वरदान मिल गया था कि कोई भी देवता-दानव उसका वध नहीं कर पाएंगे, तब देवी दुर्गा अवतरित हुई थीं और उन्होंने महिषासुर का वध किया था।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार यहां जानिए देवी दुर्गा से जुड़ी ऐसी ही कुछ और कथाएं....

श्रीकृष्ण से पहले हुआ था देवी योगमाया का अवतार

द्वापर युग में विष्णु जी श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होने वाले थे। कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और दूसरी ओर गोकुल में नंद बाबा के यहां यशोदा जी के गर्भ से देवी मां ने योगमाया के रूप में यशोदा जी के गर्भ से जन्म लिया था। उस समय यशोदा जी गहरी नींद में थीं। वसुदेव कंस के कारागार से बालक कृष्ण को लेकर गोकुल पहुंचे और कृष्ण को यशोदा जी के पास रख दिया और वहां से नन्हीं बालिका को उठाकर मथुरा के कारागार में वापस आ गए थे और बालिका को देवकी के पास रख दिया।

कंस को जब देवकी की आठवीं संतान के बारे में खबर मिली तो वह तुरंत ही कारागार में पहुंच गया। कंस ने देवकी के पास उस नन्ही बालिका को उठा लिया और जैसे ही कंस ने उसे मारने की कोशिश की तो बालिका उसके हाथ से छूटकर चली गईं। देवी ने जाने से पहले कंस के सामने आकाशवाणी की थी कि तुम्हारा वध करने वाला जन्म ले चुका है। योगमाया देवी का एक नाम मां विंध्यवासिनी भी है।

भक्त श्रीधर ने की थी वैष्णो देवी माता मंदिर की खोज

जम्मू-कश्मीर में कटरा शहर से करीब 15 किमी दूर एक ऊंची पहाड़ी पर वैष्णो देवी माता का मंदिर है। यहां देवी एक गुफा में विराजित हैं। माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड की अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इस गुफा की खोज करीब 700 साल पहले माता के परम भक्त श्रीधर ने की थी।

माता के परम भक्त श्रीधर कटरा के पास हंसाली गांव में रहते थे। श्रीधर ने एक बार घर में माता वैष्णो देवी के नाम से भंडारा आयोजित किया, जिसमें छोटी कन्याओं, गांवों वालों के साथ ही गुरु गोरखनाथ के शिष्य भैरवनाथ को भी बुलाया था।

ऐसा कहा जाता है कि माता वैष्णो एक कन्या के रूप में श्रीधर के यहां भंडारे में सभी लोगों को भोजन परोस रही थीं, उस समय भैरवनाथ ने खाने में मांस-मदिरा मांगी थी। जब कन्या ने इसके लिए मना किया तो भैरवनाथ क्रोधित हो गया। उसने कन्या को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कन्या ने देवी का रूप धारण किया और वहां से उड़कर त्रिकूट पर्वत की एक गुफा में चली गईं। इस गुफा में देवी ने नौ माह तक तप किया।

नौ महीनों तक भैरवनाथ वहीं गुफा के बाहर देवी का इंतजार करता रहा। जब देवी बाहर आईं तो उन्होंने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया। भैरवनाथ का सिर भैरव घाटी में गिरा था, जहां आज भैरवनाथ का मंदिर है। भैरवनाथ ने मरते समय देवी से क्षमा मांगी और देवी की आराधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर देवी वैष्णो ने भैरवनाथ को भी पूजनीय होने का वर दिया था।

वैष्णो देवी मंदिर की गुफा में देवी तीन रूपों में विराजित हैं। यहां भक्तों को महाकाली, मां सरस्वती और महालक्ष्मी स्वरूपों में देवी दर्शन देती हैं।

माता दुर्गा ने कैसे तोड़ा देवताओं का घमंड

एक बार देवताओं को अपनी शक्ति पर घमंड हो गया था। जब माता दुर्गा ने देवताओं का घमंड देखा तो वे एक तेजपुंज के रूप में प्रकट हुईं। विराट तेजपुंज का रहस्य जानने के लिए इंद्र ने पवनदेव को भेजा।

पवनदेव ने खुद को सबसे शक्तिशाली देवता बताया। तब तेजपुंज ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखा और तिनके को उड़ाने की चुनौती दी। पूरी ताकत लगाने के बाद भी पवनदेव उस तिनके को हिला न सके।इनके बाद अग्निदेव पहुंचे तो उन्हें चुनौती दी की इस तिनके को जलाकर दिखाएं, लेकिन अग्निदेव की असफल हो गए।

इन दोनों देवताओं की हार के बाद देवराज इंद्र का घमंड टूट गया और उन्होंने तेजपुंज की उपासना की। देवी मां वहां प्रकट हुईं और घमंड न करने की सलाह दी।

असंख्य आंखों के साथ प्रकट हुई थीं शाकंभरी

एक बार असुरों के आतंक की वजह से धरती पर कई वर्षों तक सूखा और अकाल पड़ गया था। तब भक्तों के दुख दूर करने के लिए असंख्य आंखों वाली देवी शाकंभरी प्रकट हुईं।

देवी ने लगातार नौ दिनों तक अपनी हजारों से आंसुओं की बारिश की थी, जिससे पृथ्वी पर फिर से हरियाली छा गई थी। शाकंभरी को ही शताक्षी नाम से भी जाना जाता है। इस स्वरूप में देवी फल और वनस्पतियों के प्रकट हुई थीं।

पौष मास की शुक्ल अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्रि शुरू होती है, जो कि पौष पूर्णिमा पर समाप्त होती है। पौष पूर्णिमा पर अन्न, कच्ची सब्जी, फल और जल दान करने की परंपरा है।

जब देवी ने लिया भ्रामरी देवी का अवतार

अरुण नाम के एक दैत्य ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। अरुण ने वर मांगा कि युद्ध में कोई मुझे मार न सके, किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु न हो, कोई भी महिला-पुरुष मुझे मार न सके, न ही दो और चार पैर वाले मेरा वध कर सके, मैं देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं।

ब्रह्मा जी ने उसे ये सारे वरदान दे दिए। वरदान से वह बहुत शक्तिशाली हो गया था। उसका आतंक बढ़ने लगा। सभी देवता त्रस्त हो गए थे। तभी आकाशवाणी हुई कि देवता देवी भगवती को प्रसन्न करें। आकाशवाणी सुनकर सभी देवताओं ने देवी के लिए तप किया।

तपस्या से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं। देवी के छह पैर थे। देवी चारों ओर से असंख्य भ्रमरों यानी एक विशेष प्रकार की बड़ी मधुमक्खी से घिरी हुई थीं। भ्रमरों से घिरी होने के कारण देवताओं ने उन्हें भ्रामरी देवी नाम दिया। देवी मां ने अपने भ्रमरों को अरुण असुर को मारने का आदेश दिया।

कुछ ही पलों में असंख्य भ्रमर दैत्य अरुण के शरीर पर चिपक गए और उसे काटने लगे। काफी प्रयासों के बाद भी वह भ्रमरों के हमले से नहीं बच पाया और उसका वध हो गया।

ऐसे हुआ मां चामुंडा का अवतार

पुराने समय में शुंभ और निशुंभ नाम के दो असुर थे। इन दोनों ने देवराज इंद्र और सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ का आतंक खत्म करने के लिए माता पार्वती से प्रार्थना की।

तब पार्वती माता के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं, जिनका नाम शिवा था। शिवा देवी का एक नाम अंबिका भी है।

शुंभ-निशुंभ के सेवक चंड-मुंड ने अंबिका देवी को देखा तो वे मोहित हो गए। चंड-मुंड ने शुंभ-निशुंभ के सामने देवी की प्रशंसा की तो शुंभ निशुंभ ने देवी को अपने महल में लेकर आने की आज्ञा दी।

चंड-मुंड सेना सहित देवी के सामने पहुंच गए। उस समय देवी अंबिका के शरीर से एक और देवी प्रकट हुईं, जो दिखने में बहुत भयानक थीं, जिन्हें कालिका के नाम से जाना जाता है। कालिका ने चंड-मुंड का वध कर दिया। इस कारण देवी को चामुंडा नाम मिला।

चंड-मुंड के बाद शुंभ-निशुंभ ने रक्तबीज को भेजा। रक्तबीज के खून की बूंद जहां-जहां गिरती थीं, वहां-वहां राक्षस उत्पन्न हो जाते थे। तब देवी चंडिका ने रक्तबीज को पूरा निगल लिया था। रक्तबीज के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ का भी वध कर दिया।