निर्जला एकादशी 10 जून को:इस व्रत से बढ़ती है उम्र, जल और तिल दान से मिलता अश्वमेध यज्ञ का पुण्य; पितर भी तृप्त होते

2 महीने पहले
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निर्जला एकादशी व्रत 10 जून को होगा। महाभारत, स्कंद और पद्म पुराण के मुताबिक निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को किया जाता है। इस व्रत के दौरान सूर्योदय से लेकर अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक पानी नहीं पीने का विधान है। इस कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। ग्रंथों का कहना है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने वालों की उम्र बढ़ती है और मोक्ष मिलता है।

पानी का महत्व बताने वाला व्रत
पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र का कहना है कि निर्जला एकादशी व्रत में पानी का महत्व बताया है। ज्येष्ठ के महीने में जल की पूजा और दान का बहुत महत्व है। इसलिए इस तिथि पर पूरे दिन पानी नहीं पिया जाता। साथ ही पानी से भरे मटकों का दान करते हैं और जरुरतमंद लोगों को पानी पिलाते हैं। इस तिथि पर तुलसी और पीपल में भी पानी चढ़ाने से कई गुना पुण्य मिलता है। निर्जला एकादशी का व्रत महाभारत काल में भीम ने किया था। जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिली थी। यही वजह है कि इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं।

निर्जला एकादशी पर दान का महत्व
डॉ. मिश्र के मुताबिक निर्जला एकादशी पर जरुरतमंद लोगों को जल दान के साथ ही अन्न, कपड़े, आसन, जूता, छाता, पंखा और फलों का दान करना चाहिए। इस दिन जल से भरे कलश और तिल का दान करने से अश्वमेध यज्ञ करने जितना पुण्य मिलता है। जिससे पाप खत्म हो जाते हैं। इस दान से व्रत करने वाले के पितर भी तृप्त हो जाते हैं। इस व्रत से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष भी खत्म हो जाता है और हर एकादशी व्रत के पुण्य का फल मिलता है। श्रद्धा से जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह हर तरह के पापों से मुक्त होता है।

निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि
डॉ. मिश्र के अनुसार इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल नहीं पिया जाता और भोजन भी नहीं किया जाता है। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर तीर्थ स्नान करना चाहिए। संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाना चाहिए।

1. भगवान विष्णु की पूजा, दान और दिनभर व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। 2. पीले कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए। पूजा में पीले फूल और पीली मिठाई जरूरी शामिल करनी चाहिए। 3. इसके बाद ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। फिर श्रद्धा और भक्ति से कथा सुननी चाहिए। 4. जल से कलश भरे और उसे सफेद वस्त्र से ढंक कर रखें। उस पर चीनी और दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

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