धर्म / निर्जला एकादशी और मंगलवार का योग, निर्जल रहकर व्रत करने की परंपरा, द्वादशी पर जल कलश का दान करें

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  • ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व है सबसे ज्यादा, सालभर की एकादशियों का मिलता है पुण्य

दैनिक भास्कर

Jun 02, 2020, 10:50 AM IST

मंगलवार, 2 जून को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। मंगलवार और एकादशी के योग में भगवान विष्णु के साथ ही हनुमानजी की भी पूजा करें। उज्जैन के भागवत कथाकार पं. मनीष शर्मा के अनुसार निर्जला एकादशी का महत्व सालभर की सभी एकादशियों से अधिक है। इस एक व्रत से सालभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य मिलता है।

निर्जल रहकर व्रत करने का पर्व

ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने की परंपरा है। इस दिन जल भी ग्रहण नहीं किया जाता। अभी गर्मी का समय है। इस स्थिति में पूरे दिन बिना पानी पिए व्रत करना तपस्या के समान रहता है। इस कठिन तप की वजह से ही निर्जला एकादशी श्रेष्ठ मानी गई है। इस व्रत से आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

व्रत करने वाले को ध्यान रखनी चाहिए ये बातें

निर्जला एकादशी पर पूरे दिन निर्जल रहना होता है। भगवान विष्णु की पूजा करें। मंगलवार और एकादशी के योग में हनुमानजी की भी पूजा जरूर करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। पूरे दिन व्रत करने के बाद अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर जल कलश का दान करना चाहिए। पूजा करें। इसके बाद भोजन ग्रहण करें।

महाभारत की कथा

महाभारत में पांडव पुत्र भीम के उदर में वृक नामक अग्रि थी, इसलिए उन्हें वृकोदर भी कहा जाता है। उनमें भोजन पचाने की शक्ति और भूख बहुत ज्यादा थी। सभी पांडव एकादशी का व्रत करते थे, लेकिन भीम नहीं कर पाते थे। तब वेदव्यास ने भीम को निर्जला एकादशी का महत्व बताया। भीम ये व्रत किया, इस वजह से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। 

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