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शरद पूर्णिमा पर पंचांग भेद:ज्योतिषीयों का कहना है 20 को सुबह करें स्नान-दान और रात को चंद्रमा की रोशनी में रखें खीर

3 महीने पहले
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  • मान्यता: शरद पूर्णिमा पर ही बनता था सोमरस, इस रात चंद्रमा की किरणें अपनी नाभि पर लेता था रावण

धर्म ग्रंथों में शरद ऋतु में आने वाली पूर्णिमा बहुत खास मानी गई है। इस तिथि पर चंद्रमा की रोशनी में औषधीय गुण आ जाते हैं। इसलिए इस दिन चंद्रमा की चांदनी में खीर रखने और उसे अगले दिन प्रसाद के तौर पर खाने की परंपरा है। इस बार पंचांग भेद होने से शरद पूर्णिमा की तारीख को लेकर देश में कई जगह मतभेद है। कुछ कैलेंडर में 19 और कुछ पंचांग के मुताबिक 20 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा पर्व मनाया जाएगा।

ज्योतिषीयों का मत: शरद पूर्णिमा 20 को
बीएचयू, ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पाण्डेय बताते हैं कि जब अश्विन महीने की 2 पूर्णिमा दो दिन हो तो अगले दिन शरद पूर्णिमा उत्सव मनाना चाहिए। पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र का भी कहना है कि तिथि भेद वाली स्थिति में जब पूर्णिमा और प्रतिपदा एक ही दिन हो तब शरद पूर्णिमा पर्व मनाना चाहिए। व्रत और पर्वों की तिथि तय करने वाले ग्रंथ निर्णय सिंधु में भी ये ही लिखा है।

काशी विद्वत परिषद के मंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के मुताबिक पूर्णिमा तिथि 19 अक्टूबर, मंगलवार को शाम 6.45 से शुरू होगी और बुधवार की शाम 7.37 तक रहेगी। इसलिए अश्विन महीने का शरद पूर्णिमा पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाना चाहिए। इस दिन सुबह स्नान-दान और पूजा-पाठ किया जाएगा और रात को चंद्रमा की रोशनी में खीर रखी जाएगी।

शरद पूर्णिमा पर दीपदान की परंपरा
शरद पूर्णिमा के दिन ऐरावत पर बैठे इंद्र और महालक्ष्मी की पूजा करने से हर तरह का सुख और समृद्धि मिलती है। इस दिन व्रत या उपवास भी करना चाहिए और कांसे के बर्तन में घी भरकर दान करने से कई गुना पुण्य फल मिलता है। इस पर्व पर दीपदान करने की परंपरा भी है। रात में घी के दीपक जलाकर मन्दिरों, बगीचों और घर में रखें। साथ ही तुलसी और पीपल के पेड़ के नीचे भी रखें। ऐसा करने से जाने-अनजाने में हुए पापों का दोष कम हो जाता है।

मान्यता: शरद पूर्णिमा पर ही बनता था सोमरस
शरद पूर्णिमा पर औषधियों की ताकत और बढ़ जाती है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की रोशनी में ही सोमलता नाम की औषधि का अर्क निकालकर रस बनाया जाता था जिसे सोमरस कहते हैं। इसी रस को देवता पीते थे। जिससे अमृत तत्व और देवताओं की शक्ति बढ़ती थी। ये भी कहा जाता है कि लंकापति रावण शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों को अपनी नाभि में ग्रहण करता था। ऐसा करने से उसे पुनर्योवन शक्ति मिलती थी। यानी उसकी ताकत और बढ़ जाती थी।

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