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पौष महीने की एकादशी गुरुवार को:पुत्रदा एकादशी व्रत से मिलता है संतान सुख और दूर होती है सेहत से जुड़ी परेशानियां

4 महीने पहले
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13 जनवरी, गुरुवार को पौष महीने की पुत्रदा एकादशी रहेगी। पुराणों और महाभारत में बताया गया है कि इस व्रत को करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। इसका महत्व भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। इस व्रत को करने से संतान सुख बढ़ता है। महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए भी ये व्रत करती हैं। इस दिन व्रत करने से शारीरिक परेशानियां भी दूर होने लगती हैं।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था ये व्रत
पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। पुत्रदा एकादशी का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कर के रात्रि जागरण करने का बहुत महत्व है। इस व्रत को करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वह हजारों सालों तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता। जो पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं, वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

पुत्रदा एकादशी व्रत और पूजा विधि
पुत्रदा एकादशी की सुबह स्नान आदि करने के बाद किसी साफ स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद शंख में जल लेकर प्रतिमा का अभिषेक करें।
भगवान विष्णु को चंदन का तिलक लगाएं। चावल, फूल, अबीर, गुलाल, इत्र आदि से पूजा करें। इसके बाद दीपक जलाएं।
पीले वस्त्र अर्पित करें। मौसमी फलों के साथ आंवला, लौंग, नींबू, सुपारी भी चढ़ाएं। इसके बाद गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाएं।
दिन भर कुछ खाएं नहीं। संभव न हो तो एक समय भोजन कर सकते हैं। रात को मूर्ति के पास ही जागरण करें। भगवान के भजन गाएं।
अगले दिन ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके बाद ही उपवास खोलें। इस तरह व्रत और पूजा करने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है।

व्रत की कथा
भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए पति-पत्नी हमेशा चिन्ता और दुख में रहते थे। इसी शोक में एक दिन राजा सुकेतुमान वन में चले गए। जब राजा को प्यास लगी तो वो सरोवर के पास पहुंचे। वहां कई मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने उनकी वंदना की। प्रसन्न होकर मुनियों ने राजा से वरदान मांगने को कहा।
राजा ने जब अपना दुख सुनाया तो मुनि बोले कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकदाशी कहते हैं। उस दिन व्रत रखने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है। तुम भी वही व्रत करो। ऋषियों के कहने पर राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। कुछ ही दिनों बाद रानी चम्पा ने गर्भधारण किया। उचित समय आने पर रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट किया तथा न्यायपूर्वक शासन किया।

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