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अक्षय पुण्य वाला पर्व:वैशाख पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा और स्नान-दान से पूरी होती हैं मनोकामनाएं, मिलता है कभी न खत्म होने वाला पुण्य

14 दिन पहले
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख महीने की पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी होती है। इस दिन बुद्ध भगवान का जन्म भी हुआ था इसलिए इसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को वैशाख माह अति प्रिय है।

ये पूर्णिमा पर्व 16 मई को है। ग्रंथों के अनुसार इस दिन चंद्रमा की पूजा करने से चंद्र दोष से मुक्ति मिलती है। ब्रह्मा जी ने वैशाख को सभी महीनों में सबसे खास कहा है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा आदि करने से भगवान विष्णु के साथ-साथ मृत्यु के देवता यमराज को भी प्रसन्न किया जा सकता है।

यमराज की पूजा भी होती है
पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र बताते हैं कि मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए वैशाख पूर्णिमा के दिन व्रत रखा जाता है और विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस अवसर पर जल पात्र, कुल्हड़, पंखे, चप्पलें, छाता, घी, फल, चीनी, चावल, नमक का दान शुभकारी होता है। इस दिन दान से मन को शांति मिलती है। मान्यता है कि साधक को इस दिन भगवान विष्णु के साथ यमराज का वरदान भी प्राप्त होता है और अकाल मृत्यु की शंका भी नहीं रहती।

पूर्णिमा पर ऐसे करें पूजा
1.
वैशाख पूर्णिमा पर चंद्रमा के साथ भगवान विष्णु की पूजन का विधान है। इस दिन श्री हरि की कृपा पाने के लिए उन्हें भोग लागएं और पंचामृत अर्पित करें। इस दिन वैशाख स्नान की पूर्णाहुति होती है।
2. वैशाख पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान का विधान है। इस दिन स्नान आदि के बाद दान पुण्य किया जाता है।
3. पूर्णिमा पर यमराज के निमित्त जल से भरा कलश, पकवान और मिठाइयां आदि उन्हें अर्पित करें। शक्कर और तिल का दान करने से अनजाने में हुए पापों का विनाश होता है। स्थिर चित्त और एकाग्र मन से यमराज की पूजा करें।

मिलता है दान का अक्षय फल
पुराणों में कहा गया है कि इस वैशाख महीने की पूर्णिमा पर श्रद्धा अनुसार किए गए दान का पुण्य कभी खत्म नहीं होता। इससे इस लोक के साथ परलोक में भी सुख प्राप्ति होती है। ग्रंथों के अनुसार इस दिन तिल, अन्न और जल दान करने का सबसे ज्यादा महत्व है। ये सोना, चांदी, हाथी और घोड़ों के दान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अन्न और जल दान से मानव, देवता, पितृ सभी को तृप्ति मिल जाती है। शास्त्रों के अनुसार कन्यादान को भी इन सभी के बराबर माना जाता है।

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