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पितृपक्ष 17 सितंबर तक:देश में उत्तराखंड से कर्नाटक तक 7 ऐसे पितृ तीर्थ हैं जहां पर श्राद्ध करने से संतुष्ट हो जाते हैं पितर

3 महीने पहले
  • ब्रह्माजी से जुड़े हैं महाराष्ट्र और राजस्थान के पितृ तीर्थ, कर्नाटक और बिहार में श्रीराम ने किया था श्राद्ध

17 सितंबर तक चलने वाले श्राद्धपक्ष में पितरों के लिए विशेष पूजा करने का महत्व है। इसके लिए देश के 7 राज्यों में विशेष जगह हैं। जहां पिंडदान और तर्पण करने से पितृ संतुष्ट होते हैं। इनमें बिहार के साथ ही उत्तराखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में भी पितरों की पूजा के लिए ग्रंथों में पितृ तीर्थ बताए गए हैं।

  • जहां कर्नाटक का लक्ष्मण बाग और बिहार का गया तीर्थ श्रीराम से जुड़ा है। वहीं महाराष्ट्र का मेघंकर और राजस्थान का लोहार्गल तीर्थ ब्रह्माजी से जुड़ा है। इनके अलावा माना जाता है कि उज्जैन का सिद्धवट यानी बरगद का पेड़ देवी पार्वती द्वारा लगाया गया है और प्रयागराज का महत्व ब्रह्म वैवर्त पुराण में बताया गया है। इस तरह सभी पितृ तीर्थों का पौराणिक महत्व है।

देश के 7 पितृ तीर्थ जहां श्राद्ध करने से संतुष्ट होते हैं पितर

ब्रह्म कपाल (उत्तराखंड)
यह स्थान बद्रीनाथ के निकट ही है, जिसे श्राद्ध कर्म के लिए काफी पवित्र माना गया है। पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि ब्रह्मकपाल में श्राद्ध कर्म करने के बाद पूर्वजों की आत्माएं तृप्त होती हैं और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति यहां आकर पिंडदान करता है उसे फिर कभी पिंडदान की आवश्यकता नहीं होती।

मेघंकर (महाराष्ट्र)
मान्यताओं के अनुसार मेघंकर तीर्थ को साक्षात भगवान जर्नादन का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि जब सृष्टि के आरंभ में ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था तो उस यज्ञ के दौरान उपयोग में आने वाले बर्तन में से इस नदी का उद्भव हुआ था। जिस व्यक्ति का यहां श्राद्ध किया जाता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

लक्ष्मण बाण (कर्नाटक)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सीताहरण के बाद श्रीराम व लक्ष्मण माल्यवान पर्वत पर रुके थे। यहां के मंदिर में राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां हैं। मंदिर के पिछले भाग में ही लक्ष्मण कुंड है, जो यहां का मुख्य स्थान है। इसे लक्ष्मणजी ने बाण मारकर प्रकट किया था। ऐसा भी माना जाता है कि यहां श्रीराम ने अपने पिता का श्राद्ध किया था।

सिद्धनाथ (मध्य प्रदेश)
उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित है सिद्धनाथ तीर्थ। इस तीर्थ के निकट ही विशाल वट वृक्ष है जिसे सिद्धवट के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है, यहां हर माह की कृष्ण चतुर्दशी और श्राद्ध पक्ष में लोग श्राद्ध करने के लिए आते हैं। कहते हैं कि यहां हुआ श्राद्ध सिद्ध योगियों को ही नसीब होता है।

लोहागढ़ (राजस्थान)
लोहागढ़ वह स्थान है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं। यहां जिस भी व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है उसे मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है। लोहागर की परिक्रमा भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि से पूर्णिमा तक होती है। एक मान्यता यह भी है की यहां पानी में पांडवों के अस्त्र-शस्त्र गल गए थे, इसलिए इस जगह का नाम लोहार्गल पड़ा।

गया (बिहार)
यह फल्गु नदी के तट पर बसा है। पितृ पक्ष के दौरान यहां रोज हजारों श्रद्धालु अपने पितरों के पिंडदान के लिए आते हैं। मान्यता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से पूर्वजों को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। गया में पिंडदान से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है। इस तीर्थ का वर्णन रामायण में भी मिलता है।

प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
जिस तरह ग्रहों में सूर्य को राजा माना गया है वैसे ही तीर्थ स्थलों में प्रयाग को प्रयागराज कहा गया है। प्रयाग में श्राद्धकर्म प्रमुख रूप से संपन्न कराए जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जिस किसी भी व्यक्ति का तर्पण एवं अन्य श्राद्ध कर्म यहां विधि-विधान से संपन्न हो जाते हैं वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

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