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भगवान नरसिंह का प्राकट्योत्सव 14 को:विष्णुजी ने नृसिंह रूप में लिया था चौथा अवतार, इनकी पूजा से दूर होती हैं बीमारियां

12 दिन पहले
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वैशाख महीना खत्म होने से दो दिन पहले भगवान नरसिंह का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। ग्रंथों के मुताबिक वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु का चौथा अवतार हुआ। जो नरसिंह रूप में था। यानी जिसका आधा शरीर इंसान का और आधा शेर का था। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत का दिन भी माना जाता है। क्योंकि भगवान नरसिंह ने प्रकट होते ही राक्षस हिरण्यकश्यप को मारकर भक्त प्रहल्लाद को बचाया था। इस बार ये पर्व 14 मई, शनिवार को मनेगा।

कौन था हिरण्यकश्यप
पुराणों के मुताबिक कश्यप ऋषि के दो बेटे थे। पहला हिरण्याक्ष और दूसरे का नाम हिरण्यकश्यप था। दोनों में राक्षसों वाले गुण थे। इस वजह से धरती को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वराह रूप लेकर कश्यप ऋषि के बेटे हिरण्याक्ष को मार दिया था।

भाई की मौत से दुखी और गुस्सा होकर हिरण्यकश्यप ने बदला लेने के लिए कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान लिया कि वो किसी इंसान से नहीं मरे सके और न ही किसी जानवर से। न दिन में, न रात में, न घर में, न बाहर, न किसी हथियार से मरे। ऐसा वरदान मिलने से वो खुद को अमर समझने लगा। फिर उसने इंद्र का राज्य छीना और ऋषियों को भी परेशान करने लगा। वो चाहता था कि सब उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा बंद करवा दी थी।

खम्बे से प्रकट हुए भगवान
हिरण्यकश्यप का बेटा प्रह्लाद, भगवान विष्णु का भक्त था। भगवान की पूजा से रोकने के लिए उसे कई बार परेशान किया। फिर भी वो विष्णुजी की पूजा करता रहा। इस कारण हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मारने के लिए कोशिशें की लेकिन भगवान प्रह्लाद को हर बार बचा लेते थे।
एक दिन गुस्से में हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से बोला, कहां है तेरा भगवान। सामने बुला। प्रह्लाद ने कहा, भगवान तो कण -कण में हैं। हिरण्यकश्यप ने कहा, अच्छा इस खम्बे में तेरा भगवान छिपा है? प्रह्लाद ने कहा, हां। ये सुनकर हिरण्यकश्यप ने अपनी गदा से खम्बे पर मारा, तभी खम्बे से भगवान नृसिंह प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को अपने जांघों पर रखकर उसकी छाती को नाखूनों से फाड़कर उसको मार डाला।

भगवान करते हैं रक्षा
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर विष्णुजी के चौथे अवतार के रूप में भगवान नृसिंह पूजा की जाती है साथ ही इस दिन व्रत और उपवास भी किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाले को भगवान की पूजा के साथ ही श्रद्धा के हिसाब से अन्न, जल, तिल, कपड़े या लोगों की जरूरत के हिसाब से चीजों का दान देना चाहिए। इस दिन व्रत करने वाले के हर तरह के दुख खत्म हो जाते हैं। दुश्मनों पर जीत मिलती है और मनोकामना भी पूरी होती है।

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