व्रत-उपवास:संकष्टी चतुर्थी और शुक्रवार के योग में गणेश जी के साथ ही महालक्ष्मी और शुक्र ग्रह की पूजा जरूर करें

7 महीने पहले
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शुक्रवार, 17 जून को आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है। इसे संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। शुक्रवार ये तिथि होने से इस दिन गणेश जी, महालक्ष्मी और शुक्र ग्रह की विशेष पूजा करें। चतुर्थी के स्वामी गणेश जी हैं, शुक्रवार को देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। जिन लोगों की कुंडली में शुक्र ग्रह से संबंधित दोष हैं, उन्हें शुक्रवार को शुक्र ग्रह की पूजा करने की सलाह ज्योतिषियों द्वारा दी जाती है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक संकष्टी चतुर्थी पर गणेश जी के लिए व्रत किया जाता है। जो लोग ये व्रत करते हैं, उन्हें शाम को चंद्रोदय तक निराहार रहना होता है। चंद्रोदय के बाद गणेश जी और चंद्र की पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत पूरा होता है और आहार लिया जा सकता है। संकष्टी चतुर्थी पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। इस योग में किए गए पूजा-पाठ और अन्य शुभ काम जल्दी सफल हो सकते हैं।

जीवन के सभी संकटों को दूर करता है चतुर्थी व्रत

हिन्दी पंचांग के हर महीने में दो चतुर्थी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। चतुर्थी तिथि पर गणेश जी के लिए खास पूजा-पाठ करने की परंपरा है। इस तिथि के स्वामी गणेश जी ही हैं, क्योंकि इसी तिथि पर गणेश जी प्रकट हुए। जो लोग एक वर्ष में आने वाली सभी 24 चतुर्थी पर व्रत करते हैं, उन्हें जीवन के सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। ऐसी मान्यता है कि चतुर्थी का व्रत करने से गणेश जी की कृपा मिलती है और घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

ऐसे कर सकते हैं गणेश जी और महालक्ष्मी की सरल पूजा

प्रथम पूज्य गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा में इनकी प्रतिमाओं का अभिषेक करें। दूध, दही, घी, शहद और मिश्री मिलाकर पंचामृत बनाएं और अभिषेक करें। इसके बाद स्वच्छ जल अर्पित करें। हार-फूल, वस्त्र, आभूषण चढ़ाएं। कुमकुम, चंदन, चावल, इत्र, कमल के फूल चढ़ाएं। गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें। मिठाई का या लड्डूओं का भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर आरती करें। पूजा के अंत में भगवान से भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें। पूजा के बाद प्रसाद वितरीत करें और खुद भी ग्रहण करें।

ऐसे कर सकते हैं शुक्र ग्रह के लिए विशेष पूजा

शुक्र ग्रह की पूजा शिवलिंग के रूप में की जाती है। शुक्रवार को शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं। बिल्व पत्र, आंकड़े के फूल, जनेऊ धतूरा आदि चीजें चढ़ाएं। चंदन का तिलक करें। ऊँ नम: शिवाय और ऊँ शुं शुक्राय नम: मंत्र का जप करें। भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर आरती करें।