आज संत रविदास जयंती:अपनी ईमानदारी और कड़ी मेहनत से कमाया गया धन ही सुख-शांति देता है, इसलिए आत्म निर्भर बनें

4 महीने पहले
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आज (5 फरवरी, माघी पूर्णिमा) संत रविदास जी की जयंती है। संत रविदास जी के बताए सूत्रों को जीवन में उतारने से हमारी सभी समस्याएं खत्म हो सकती हैं और सुख-शांति मिल सकती है। जानिए रविदास जी से जुड़ा एक किस्सा, जिसमें जीवन को सुखी और शांत बनाने के सूत्र छिपे हैं...

एक दिन संत रविदास जी अपनी झोपड़ी में जूते बनाने का काम कर रहे थे। उस समय एक साधु उनके पास पहुंचे। रविदास जी ने उनकी बहुत सेवा की, जिससे वे प्रसन्न हो गए। जाते समय साधु ने अपनी झोली में से एक पत्थर निकाला और रविदास जी को दे दिया।

साधु ने रविदास जी से कहा कि ये पत्थर बहुत चमत्कारी है, इसे पारस पत्थर कहते हैं। इस पत्थर के स्पर्श से लोहे की चीज सोने की बन जाती है। इस पत्थर की मदद से तुम अपनी गरीबी दूर कर सकते हो। ये कहते हुए साधु ने लोहे के एक टुकड़े को सोना का बना दिया।

रविदास जी ने पारस पत्थर लेने से मना कर दिया और कहा कि मुझे इसकी जरूरत नहीं है, मैं अपनी मेहनत से जितना कमाता हूं, उतने में मेरा काम हो जाता है।

साधु ने रविदास जी की बातें सुनीं, लेकिन वे नहीं माने और पारस पत्थर झोपड़ी में एक जगह रखकर चले गए।

कुछ समय पर बाद वही साधु संत रविदास जी के पास पहुंचे तो उनकी हालत वैसी की वैसी थी। वे अभी भी झोपड़ी में ही रह रहे थे।

रविदास जी की ऐसी हालत देखकर साधु बहुत हैरान थे। उन्होंने रविदास से पूछा कि मैंने आपको पारस पत्थर दिया था, आपने उसका उपयोग नहीं किया?

साधु की बात सुनकर रविदास जी ने कहा कि वह पत्थर वहीं होगा, जहां आपने रखा था।

साधु ने उस जगह पर देखा तो पारस पत्थर वहीं रखा था। उन्होंने रविदास जी से पूछा कि आप चाहते तो धनवान बन सकते थे, लेकिन आपने से पारस पत्थर को देखा तक नहीं। ऐसा क्यों?

संत रविदास ने कहा कि अगर मैं सोना बना लेता, धनवान हो जाता तो धन की रखवाली करने की चिंता करनी पड़ती, अगर मैं गरीबों को दान करता तो मैं प्रसिद्ध हो जाता है और फिर मेरे यहां जरूरतमंद लोगों की भीड़ लगी रहती। सभी की मदद करने में लगा रहता तो मेरे पास भगवान का ध्यान करने का समय ही नहीं बचता। मैं मेरे काम से मेरी जरूरत के हिसाब से धन कमा लेता हूं और बाकी समय में भगवान का ध्यान करते रहता हूं। इसी में मुझे सुख-शांति मिलती है।

साधु रविदास जी के विचार सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और अपना पारस पत्थर लेकर लौट गए।

रविदास की सीख

इस किस्से में रविदास जी ने सीख दी है कि हमें लालच से बचना चाहिए, दूसरों पर और दूसरों के धन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। जो लोग खुद की मेहनत और ईमानदारी से धन कमाकर जीविका चलाते हैं, उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इसलिए हमें आत्म निर्भर बनना चाहिए।

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