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मान्यताएं:शनि जयंती 30 मई को, सूर्य पुत्र शनि के भाई-बहन हैं यमराज और यमुना; मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं शनि

एक महीने पहले
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अगले सप्ताह सोमवार, 30 मई को नौ ग्रहों में से एक शनि देव की जयंती है। शनि देव का जन्म ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर हुआ था। इस समय शनि कुंभ राशि में है। शनि मकर और कुंभ राशि का स्वामी है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक शनि कुंभ राशि में अधिक प्रभावी रहता है। शनि देव सूर्य के पुत्र हैं। यमराज और यमुना जी इनके भाई-बहन हैं। ज्योतिष में शनि को ग्रहों का न्यायाधीश माना जाता है। यही हमें हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है। शनि साढ़ेसाती और ढय्या के समय हमें सबसे अधिक प्रभावित करता है।

ये है शनि देव के जन्म से जुड़ी कथा

सूर्य देव का विवाह देव पुत्री संज्ञा से हुआ था। यमराज और यमुना जी सूर्य और संज्ञा की संतानें हैं। संज्ञा सूर्य का तेज सहन नहीं कर पाती थीं। इस कारण उन्होंने अपनी छाया को सूर्य की सेवा में नियुक्त कर दिया और खुद वहां से अपने पिता के यहां चली गईं।

शनि देव सूर्य और छाया की संतान हैं। छाया पुत्र होने की वजह से ही शनि का रंग काला माना गया है। शनि ने तपस्या करके ग्रह का और न्यायाधीश का पद प्राप्त किया है।

शनि का ग्रहों से संबंध

शनि देव सूर्य, चंद्र और मंगल से शत्रुता रखते हैं। बुध, शुक्र शनि के मित्र हैं। गुरु ग्रह के साथ शनि सामान्य रहते हैं। शनि तुला राशि में उच्च का रहता है। इस राशि में शनि की शक्ति बढ़ जाती है। मेष राशि में नीच का यानी कमजोर रहता है। ये ग्रह मकर और कुंभ राशि के यह स्वामी है।

किन राशि पर रहती है साढ़ेसाती और ढय्या

शनि जिस राशि में रहता है, उस राशि के साथ ही उस राशि के आगे और पीछे वाली राशियों पर भी साढ़ेसाती रहती है। जैसे अभी शनि कुंभ राशि में है तो कुंभ से पीछे की मकर और कुंभ से आगे की मीन राशि पर साढ़ेसाती चल रही है। शनि जिस राशि में है उस राशि से यानी छठी राशि में और दसवी राशि पर शनि का ढय्या रहता है। इस समय कर्क और वृश्चिक राशि पर शनि का ढय्या चल रहा है।

शनि जयंती पर कर सकते हैं ये शुभ काम

ज्येष्ठ अमावस्या यानी शनि जयंती पर शनि देव को सरसों का तेल अर्पित करना चाहिए। शनि देव के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं और ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप करें। तेल, जूते-चप्पल का दान करें। छाया यानी छाते का दान करें।