12 मई, गुरुवार को वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। पुराणों में इसे मोहिनी एकादशी कहा गया है। स्कंद पुराण के वैष्णवखंड के मुताबिक इस दिन समुद्र मंथन से अमृत प्रकट हुआ था और भगवान विष्णु ने विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर के अमृत की रक्षा की थी। इस एकादशी का व्रत करने वाले को एक दिन पहले यानी दशमी तिथि की रात से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए। इस व्रत में सिर्फ फलाहार ही किया जाता है।
व्रत का महत्व
भगवान विष्णु ने इस दिन मोहिनी रूप धारण किया था। इसलिए ये एकादशी खास है। इस दिन भगवान विष्णु के मोहिनी रूप की पूजा होती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने और नियम से व्रत करने पर नेगेटिविटी दूर होती है। मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। साथ ही धन, यश और वैभव बढ़ता है। घर में सुख और शांति रहती है।
मान्यता है कि इस व्रत से बार-बार जन्म लेने के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। एकादशी व्रत करने से सुख-समृद्धि और शांति मिलती है। मन और शरीर संतुलित होता है। गंभीर बीमारियों से रक्षा होती है। व्रत रखने वाला, मोहमाया और बंधनों से मुक्त हो जाता है।
पूजा और व्रत की विधि
एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर नहाएं और हो सके तो गंगाजल को पानी में डालकर नहाना चाहिए। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान की पूजा करनी चाहिए।
भगवान की मूर्ति के सामने घी का दीप जलाएं और फिर व्रत का संकल्प लें। एक कलश पर लाल वस्त्र बांधकर कलश की पूजा करें।
कलश पर विष्णु की मूर्ति रखें। प्रतिमा का अभिषेक कर शुद्ध करके नए वस्त्र पहनाएं।
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल पंचामृत और तुलसी के पत्ते चढ़ाने चाहिए।
पीले और सुगंधित फूलों से विष्णु भगवान का श्रृंगार करें। फिर धूप, दीप से आरती करें। मिठाई और फलों का भोग लगाएं। रात में भगवान का भजन कीर्तन करें।
विष्णु जी को लेना पड़ा मोहिनी रूप
इसके पीछे एक पौराणिक कथा है कि जब देवासुर संग्राम हुआ था तो उसमें देवताओं को दैत्यों के राजा बलि ने पराजित करके उनसे स्वर्ग लोक छीन लिया था। देवराज इंद्र जब भगवान विष्णु के पास समाधान के लिए पहुंचे तब विष्णु भगवान ने उन्हें क्षीरसागर में विविध रत्न होने की जानकारियां दीं और साथ-साथ यह भी बताया कि समुद्र में अमृत भी छुपा हुआ है। देवराज इंद्र को तब विष्णु भगवान ने देवों और असुरों के लिए समुद्र मंथन का प्रस्ताव रखा था।
इंद्र, विष्णु जी का प्रस्ताव लेकर दैत्यराज बलि के पास गए और समुद्र मंथन के लिए उन्हें राजी किया। फिर क्षीर सागर में समुद्र मंथन हुआ। जिसमें कुल 14 रत्न मिले। उनमें धन्वंतरी वैद्य अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। इस अमृत के लिए देवताओं और राक्षसों में लड़ाई हो गई। उस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर छल से अमृत देवताओं को पिला दिया। जिससे देवता अमर हुए। जिस दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया था। उस दिन वैशाख माह की एकादशी तिथि थी। इसलिए इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं।
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