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गोस्वामी तुलसीदास की जयंती:तुलसीदास जी ने 76 वर्ष की उम्र में लिखा था ग्रंथ, आज भी सुरक्षित हैं अयोध्या कांड की पांडुलिपियां

6 दिन पहले
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श्रीरामचरित मानस मंदिर की देखरेख पं. रामाश्रय त्रिपाठी करते हैं। इन्हीं के पास अयोध्या कांड की पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। - Dainik Bhaskar
श्रीरामचरित मानस मंदिर की देखरेख पं. रामाश्रय त्रिपाठी करते हैं। इन्हीं के पास अयोध्या कांड की पांडुलिपियां सुरक्षित हैं।

गुरुवार, 4 अगस्त को श्रीरामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1554 में सावन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर हुआ था। उनका जन्म स्थान उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर गांव है। यहीं श्रीरामचरित मानस मंदिर स्थित है। तुलसीदास जी की जयंती के अवसर पर मानस मंदिर में अखंड रामायण के पाठ का समापन होगा। इस दिन यहां भंडारा भी है। हजारों भक्त यहां पहुंचेंगे।

तुलसीदास जी के जन्म समय को लेकर मतभेद भी हैं। कुछ विद्वान उनका जन्म सन् 1511 मानते हैं। राजापुर गांव में तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस ग्रंथ की रचना की थी। वर्तमान में यहीं श्रीरामचरित मानस मंदिर है। संवत्‌ 1680 में 126 वर्ष की आयु में तुलसीदास जी की मृत्यु हुई थी।

ये श्रीरामचरित मानस ग्रंथ की पांडुलिपि की तस्वीर है।
ये श्रीरामचरित मानस ग्रंथ की पांडुलिपि की तस्वीर है।

श्रीरामचरित मानस मंदिर के प्रमुख 79 वर्षीय पं. रामाश्रय त्रिपाठी हैं। वे तुलसीदास जी की शिष्य परंपरा की 11वीं पीढ़ी के प्रमुख हैं। तुलसीदास जी के पहले प्रमुख शिष्य गणपतराम उपाध्याय थे। उनके परिवार के लोग ही इस मंदिर के प्रमुख होते हैं। यहां के आठवें प्रमुख मुन्नीलाल की कोई संतान नहीं थी। तब उन्होंने अपनी बहन के बेटे ब्रह्मदत्त त्रिपाठी को गोद लिया और उन्हें इस मंदिर का प्रमुख नियुक्त किया।

ब्रह्मदत्त त्रिपाठी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रामाश्रय त्रिपाठी 15-16 वर्ष की उम्र से ही इस मंदिर की देखभाल कर रहे हैं। त्रिपाठी जी के पास आज भी श्रीरामचरित मानस के अयोध्याकांड की पांडुलिपियां सुरक्षित रखी हैं। मंदिर में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान जी के साथ ही तुलसीदास जी की भी प्रतिमा स्थापित है।

ये तुलसीदास जी की शिष्य परंपरा की पीढ़ियों के नाम हैं।
ये तुलसीदास जी की शिष्य परंपरा की पीढ़ियों के नाम हैं।

2 साल 7 महीने और 26 दिनों में हुई थी ग्रंथ की रचना

तुलसीदास जी ने संवत् 1631 में 76 वर्ष की आयु में श्रीरामचरित मानस की रचना शुरू की थी। इस ग्रंथ को पूरा होने में 2 साल 7 माह और 26 दिन का समय लगा। संवत् 1633 के अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी पर ये ग्रंथ पूरा हो गया था। अभी संवत् 2079 चल रहा है, इस हिसाब से ये पांडुलिपियां 448 साल पुरानी हैं। तुलसीदास जी के समय में कागज का आविष्कार हो चुका था। तुलसीदास जी ने लिखने के लिए स्याही खुद बनाई थी और लकड़ी की कलम से ये ग्रंथ लिखा था। उन्होंने आंवले का रस, बबूल का गोंद, सूखा काजल और अन्य चीजें मिलाकर स्याही बनाई थी।

1948 में पुरातत्व विभाग ने इसे विशेष केमिकल से संरक्षित किया था। 1980 में कानपुर वाले भक्तों ने पांडुलिपियों का लेमिनेशन करवाया। 2004 में भारत सरकार के अधिकारियों ने इन पांडुलिपियां को संरक्षित करने के लिए इन पर जापानी केमिकल लगाया गया था।